2004: भारत में ऑस्ट्रेलिया की ऐतिहासिक टेस्ट शृंखला विजय – भाग 3 (नागपुर)

नागपुर से पहले स्टीव वॉ की चर्चा करते हैं। 2001 ऐशेज शृंखला ऑस्ट्रेलिया ने पहले 3 मैचों के बाद ही 3-0 से जीत ली थी, तीसरे मैच में 36 वर्षीय स्टीव वॉ की पिंडली में 2 सेंटीमीटर का Tear हुआ था और वे शृंखला से लगभग बाहर थे, पर चूँकि यह इंग्लैंड में उनकी अंतिम शृंखला थी इसलिए वे अंतिम टेस्ट किसी भी हाल में खेलना चाहते थे। वे अभी भी पीड़ा का अनुभव कर रहे थे पर उन्होंने यह मैच खेला और अविजित 157 रन बनाए। ऑस्ट्रेलिया ने यह मैच पारी और 25 रनों से जीत लिया। स्टीव वॉ के खेलने या न खेलने से इस श्रृंखला के परिणाम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना था परंतु उन्होंने केवल एक संदेश देने के लिए यह टेस्ट खेला कि ऑस्ट्रेलियाई टीम कितनी “Tough” है। (ऑस्ट्रेलियाई दल का मानना था कि इंग्लैंड के क़ई खिलाड़ी “छोटी मोटी” चोट के कारण ऐशेज जैसी शृंखला के मैचों से बाहर रह जाया करते थे, स्वयं कप्तान नासिर हुसैन उंगली में फ्रैक्चर के कारण दो टेस्ट से बाहर रहे थे।) https://crickettalesonline.sport.blog/2021/08/29/its-about-sending-a-message-a-monumental-effort-from-steve-waugh/

“Mate I will go to war with you.”
जब सेनापति की सोच ऐसी हो तो और टीम के प्रति उसका समर्पण इस स्तर का हो तो टीम उसके लिए क्या नहीं कर सकती?

पहुँचते हैं नागपुर:

“Looks like home, doesn’t it?”
नागपुर में विदर्भ क्रिकेट असोसिएशन (VCA) स्टेडियम की पिच का निरीक्षण करते हुए अम्पायर डेविड शेफर्ड ने कहा। पिच का रंगरूप वही था जो मई के महीने में ग्लूस्टरशर की पिच का होता है।

भारतीय कप्तान सौरव गांगुली पिच से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने क्यूरेटर किशोर प्रधान से पिच की घास हटाने को कहा था, उनकी इस यह माँग पूरी नहीं की गयी थी। गांगुली ने अपनी असंतुष्टि और क्रोध किसी से छुपाया नहीं था। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, “हम घर में खेल रहे हैं जहाँ हमारी शक्ति स्पिन गेंदबाजी है और इस प्रकार की पिच हमारी एडवांटेज हमसे छीन लेती है।” [अनिल कुंबले और हरभजन सिंह ने अबतक ऑस्ट्रेलिया के कुल 40 विकेटों में से 34 विकेट लिए थे, 16 बैंगलोर में और 18 चेन्नई में।]

क्यूरेटर किशोर प्रधान ने कहा कि जैसे जैसे खेल होगा पिच से टर्न भी मिलेगा और उन्हें ये समझ नहीं आ रहा है कि इतना हंगामा किस बात पर मचाया जा रहा है।

“but where was Ganguly?”
सचिन तेंदुलकर टेनिस एल्बो की चोट से उबरकर भारतीय एकादश में लौट रहे थे। उनके आने से भारतीय मध्यक्रम सशक्त हुआ था। यदि द्रविड़, गांगुली और लक्ष्मण लय में लौटे तो भारतीय टीम इस पिच पर भी रन बना सकती थी।

प्रश्न यह था कि सौरव गांगुली हैं कहाँ? यह प्रश्न ऑस्ट्रेलियाई कप्तान ऐडम गिलक्रिस्ट और मैच रेफरी रंजन मदुगले के अतिरिक्त स्टेडियम में उपस्थित सहस्रों दर्शकों और रेडियो या टेलीविजन पर प्रसारण सुन/देख रहे श्रोताओं/ दर्शकों के मन में भी था, क्योंकि टॉस के लिए सौरव गांगुली नहीं बल्कि राहुल द्रविड़ बाहर आए थे। डीन जोन्स ने उनसे पूछा कि सौरव कहाँ हैं, राहुल ने बताया कि कदाचित उनके पैर में खिंचाव है। राहुल द्रविड़ स्वयं ही इस को लेकर पक्के नहीं थे कि सौरव को हुआ क्या है?

भारतीय एकादश में तीन परिवर्तन हुए थे। युवराज सिंह के स्थान पर आकाश चोपड़ा को पुनः अवसर मिला (जो दूसरे टेस्ट में बाहर किए गए थे) सचिन तेंदुलकर क्रमांक चार पर, इरफान पठान के स्थान पर अजित अगरकर और दूसरा चौंकाने वाला परिवर्तन था हरभजन सिंह के स्थान पर मुरली कार्तिक। राहुल द्रविड़ ने बताया था कि हरभजन सिंह को फ्लू है।

सौरव गांगुली यह टेस्ट क्यों नहीं खेल रहे यह प्रश्न अब हर किसी की जिह्वा पर था। एक बात जो सबसे अधिक चल रही थी वह यह थी कि सौरव पिच से घास न हटाए जाने को लेकर नाराज हैं और इसी कारण उन्होंने यह मैच नहीं खेला।

ऑस्ट्रेलियाई कप्तान ऐडम गिलक्रिस्ट ने अपनी आत्मकथा “True Colors” में लिखा है कि जब उन्होंने टॉस के समय राहुल से पूछा कि सौरव कहाँ हैं तो राहुल कोई निश्चित उत्तर न दे सके तो उन्होंने इसका अर्थ यह निकाला कि संभवतः गांगुली ने घर में टेस्ट शृंखला में पराजित होने के भय से ऐसा किया है।

“When I got to the middle, Ganguly was not there. Dravid was in his blazer, ready for the toss. ‘Where’s Sourav,’ I said. Rahul couldn’t answer definitively. Between the lines I perceived that Sourav might have pulled out from fear of losing a home series.”

मैथ्यू हेडन ने अपनी आत्मकथा “Standing My Ground” में लिखा है कि सौरव और हरभजन मैच से से दो दिन पूर्व जब पिच का निरीक्षण कर रहे थे तब वे ऐसे लग रहे थे मानो ओलावृष्टि के उपरांत नष्ट हुई फसल देखते किसान हों। उन्होंने (ऑस्ट्रेलियाई टीम ने) अनुमान लगाया कि दोनों में से कोई ये मैच नहीं खेलेगा। उनके अनुसार दोनों को “ग्रीन-ट्रैकाइटिस” नामक बीमारी हुई थी, जिसमें आप हरी पिच के प्रति असहिष्णु हो जाते हैं क्योंकि इसमें स्पिन गेंदबाज के लिए कुछ होता नहीं और एक बल्लेबाज के रूप में आपके लिए बहुत सिरदर्द होता है।

“When Ganguly and Harbhajan went out to see the deck a couple of days before the game, they looked like farmers inspecting crops after a hail storm. We predicted neither would play and they did not. Ganguly withdrew with a leg-muscle injury that flared up suddenly and Harbhajan had an even more sudden dose of food poisoning. We put their ailments down to acute cases of ‘greentrackitis’, where you develop a severe intolerance to green wickets likely to give you nothing as a spin bowler and plenty of headaches as a batsman.”

सौरव गांगुली ने अपनी आत्मकथा “A Century is not enough” में इस विषय का कोई उल्लेख नहीं किया है।

सत्य क्या था सौरव के न खेलने का, यह शत प्रतिशत विश्वास के साथ कह पाना संभव नहीं है।

Politics:
अब चर्चा इस विषय पर करते हैं कि विदर्भ क्रिकेट असोसिएशन ने ऐसी पिच बनवाई क्यों?

BCCI के चेयरमैन जगमोहन डालमिया का कार्यकाल समाप्त हो रहा था और BCCI के नए चेयरमैन के लिए चुनाव हाल में ही सम्पन्न हुआ था। टक्कर BCCI के दो धड़ों के बीच थी। एक था डालमिया का धड़ा और दूसरा तत्कालीन केंद्रीय मंत्री शरद पवार का। डालमिया गुट के प्रत्याशी थे हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल के पुत्र और BCCI उपाध्यक्ष रणबीर सिंह महिंद्रा। चुनाव 15-15 से बराबर था पर जगमोहन डालमिया चूँकि BCCI चेयरमैन थे, अपने कास्टिंग वोट का प्रयोग करके उन्होंने रणबीर सिंह महिंद्रा को 16-15 से विजयी बना दिया।

ऐसे समाचार चल रहे थे विदर्भ क्रिकेट असोसिएशन के चेयरमैन शशांक मनोहर (जो शरद पवार के समर्थक थे) ने पवार की पराजय का बदला लेने के लिए नागपुर में हरी पिच बनवाई।

ऐसी बातों की कोई पुष्टि तो करता नहीं अतः हम बस अनुमान ही लगा सकते हैं कि ऐसी पिच क्यों बनी होगी।

Let’s play Cricket:
पिच कैसी भी हो, अब इसपर खेलना तो था ही। ऐडम गिलक्रिस्ट ने लगातार तीसरा टॉस जीतकर बल्लेबाजी का निर्णय लिया था। मैथ्यू हेडन और जस्टिन लैंगर ने शृंखला में बड़े स्कोर नहीं बनाए थे पर उन्होंने ऑस्ट्रेलिया को हर बार ठोस शुरुआत दी थी। आज भी उन्होंने यही किया पर बड़ा स्कोर उनसे दूर ही रहा। ज़हीर खान ने दोनों को आउट किया। जब साइमन कैटिच अनिल कुंबले की गेंद पर फॉरवर्ड शॉर्ट लेग पर कैच हुए तब स्कोर था 86 रन पर 3 विकेट।

Martyn again:
डेमियन मार्टिन और उपकप्तान डैरेन लीमन ने मोर्चा संभाला। नागपुर की पिच चेन्नई से बिल्कुल भिन्न थी पर डेमियन मार्टिन तो मानो अपनी चेन्नई वाली पारी ही आगे बढ़ा रहे थे, पर तीव्र गति से।

मार्टिन ने कुंबले की गेंद को आगे निकलकर सीधे उठाकर चौका प्राप्त किया, कुंबले ने अगली गेंद शॉर्ट फेंकी और इसपर मार्टिन ने कट से चौका प्राप्त किया। दो गेंद बाद वे पुनः आगे आए और सीधा चौका लगाया। मार्टिन अनिल कुम्बले को गेंदबाजी से हटाना चाहते थे।

दूसरी ओर लीमन भी तेज गति से रन बना रहे थे। आज उनका फुटवर्क उच्च स्तरीय था। वे स्पिन गेंदबाजों पर आगे निकलकर चौके लगा रहे थे। उन्होंने 62 गेंदों में शृंखला का अपना पहला अर्धशतक पूर्ण किया। 148 रनों की साझेदारी के बाद 70 रन बनाकर डैरेन लीमन मुरली कार्तिक की गेंद पर स्लिप में कैच हुए।

डेमियन मार्टिन 98 पर आ गए थे। अजित अगरकर की शॉर्ट गेंद को चार रनों के लिए पॉइंट और एक्सट्रा कवर के बीच से निकाल दिया। यह उनका 9वाँ, 2004 में चौथा और इस शृंखला में दूसरा शतक था।

ऑस्ट्रेलिया का स्कोर 300 के पार हो गया था, मार्टिन और क्लार्क मैच के पहले ही दिन भारतीय टीम को मैच से बाहर करने का प्रयास कर रहे थे। 73वें ओवर में मार्टिन ने कुम्बले की गेंद को आगे निकलकर पुनः उठा दिया। यह चेन्नई वाले शॉट की याद दिला रहा था जिसके माध्यम से उन्होंने अपना शतक पूरा किया था पर इस बार गेंद स्टेडियम की छत पर गिरी थी। दो गेंद बाद उन्होंने पुनः यही शॉट खेलने का प्रयास किया। गेंद ऊपर तो गयी पर दूर नहीं। अजित अगरकर ने कैच पकड़ा। कुछ ही मिनट बाद ऐडम गिलक्रिस्ट ने मात्र 2 रन बनाकर मुरली कार्तिक को रिटर्न कैच थमा दिया।

बैंगलोर टेस्ट के नायक माइकल क्लार्क ने कुम्बले के ओवर में तीन चौके लगाकर अपना अर्धशतक पूर्ण किया। दिन का खेल समाप्त होने तक ऑस्ट्रेलिया का स्कोर था 90 ओवर में 362 पर 7, क्लार्क 73 पर खेल रहे थे। अंतिम दिन वे आउट होने वाले अंतिम बल्लेबाज थे। वे अपने शतक से मात्र 9 रन दूर रह गए थे पर इस शृंखला में 300 रन पूरे करने वाले पहले बल्लेबाज बने थे। ऑस्ट्रेलियाई पारी 398 पर समाप्त हुई। एक समय पाँच सौ बनाने की ओर अग्रसर ऑस्ट्रेलिया ने पिछले 6 विकेट मात्र 84 रनों पर गँवा दिए थे।

वीरेंद्र सेहवाग ने पहले ही ओवर में गिलेस्पी को चार चौके जड़ दिए। ग्लेन मक्ग्रा के विरुद्ध भी उन्होंने यही करना चाहा पर गेंद बल्ले का बाहरी किनारा ले गयी। ऐडम गिलक्रिस्ट ने एक उत्कृष्ट कैच पकड़ा। यह ग्लेन मक्ग्रा का सौवाँ टेस्ट मैच था। वे सौ टेस्ट खेलने वाले पहले ऑस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाज बने थे। जेसन गिलेस्पी ने आकाश चोपड़ा को पहली स्लिप में शेन वॉर्न के हाथों कैच कराया और चोट के बाद वापसी कर रहे सचिन तेंदुलकर को एलबीडबल्यू करके भारत का स्कोर 49 पर 3 कर दिया।

जब भी राहुल द्रविड़ और लक्ष्मण एक साथ क्रीज पर होते थे, दिमाग में कोलकाता और ऐडिलेड ताजा हो जाते थे पर आज ऐसा कुछ नहीं होना था। शेन वॉर्न ने शृंखला में तीसरी बार लक्ष्मण को आउट किया। राहुल द्रविड़ आवश्यकता से अधिक रक्षात्मक बल्लेबाजी का प्रयास कर रहे थे, रन बिल्कुल बन्द थे और ऐसा करके उन्होंने अपने ऊपर दबाव बहुत बढ़ा लिया था। ग्लेन मक्ग्रा ने बहुत अनुशासित गेंदबाजी की थी और उसका पुरस्कार उन्हें द्रविड़ के विकेट के रूप में मिला जब उनकी गेंद द्रविड़ के बल्ले का बाहरी किनारा लेकर पहली स्लिप में शेन वॉर्न के हाथों में चली गयी। 140 गेंदों तक चली इस पारी में द्रविड़ मात्र 21 रन बना सके। दूसरे दिन के खेल की समाप्ति पर स्कोर 77 ओवरों में 146 पर 5 (रनों की गति दो से भी कम). तीसरे दिन पहले ही सत्र में भारतीय टीम 185 पर सिमट गई। मोहम्मद कैफ अर्धशतक बनाने वाले एकमात्र भारतीय बल्लेबाज रहे।

पहले ओवर में 16 रन देने के बाद भी जेसन गिलेस्पी के आँकड़े थे, 22.5 ओवरों में 56 रन देकर 5 विकेट। ग्लेन मक्ग्रा ने 25 ओवरों में मात्र 27 रन देकर 3 विकेट लिए। शेन वॉर्न को 2 विकेट मिले।

ऑस्ट्रेलिया के पास 213 रनों की बढ़त थी पर ऐडम गिलक्रिस्ट ने फॉलोऑन नहीं दिया। वे भारतीय टीम को वापसी का कोई अवसर नहीं देना चाहते थे। मैथ्यू हेडन मात्र 9 रन पर आउट हुए पर जस्टिन लैंगर और कैटिच के बीच 80 रनों की साझेदारी ने ऑस्ट्रेलियाई बढ़त 300 के पार पहुँचा दी। अपना मात्र 12वाँ टेस्ट खेल रहे कैटिच ने बैंगलोर टेस्ट में 81 रनों की पारी खेली थी, उनकी आज की पारी ऑस्ट्रेलिया को 35 वर्षों में पहली बार भारत में शृंखला विजय की ओर ले जा रही थी।

ऑस्ट्रेलिया की बढ़त चार सौ होने ही वाली थी, साइमन कैटिच 99 पर थे, तभी मुरली कार्तिक की एक सीधी गेंद पर वे बल्ला न लगा सके। गेंद पैड पर लगी और कैटिच अपने शतक से 1 रन दूर रह गए।

माइकल क्लार्क इस शृंखला में अनिल कुंबले पर हावी रहे थे। उन्होंने आगे निकलकर कुम्बले की गेंद पर कवर ड्राइव से चौका लगाकर बढ़त को 400 के पार पहुँचा दिया। पहले दो टेस्ट मैचों में 18 विकेट लेने वाले कुम्बले को इस मैच में मात्र 3 विकेट प्राप्त हुए और उन्होंने 4 से अधिक की औसत से रन दिए। तीसरे दिन के खेल की समाप्ति पर ऑस्ट्रेलिया की बढ़त 415 रन थी और अभी 7 विकेट शेष थे। क्रिकेट इतिहास में कभी भी चौथी पारी में इतने रन बनाकर कोई टीम विजयी नहीं हुई थी। डेमियन मार्टिन 43 पर खेल रहे थे और लगातार तीसरे शतक के लिए तैयार थे।

चौथे दिन सवेरे दोनों बल्लेबाजों ने आक्रमण कर दिया क्योंकि गिलक्रिस्ट अपने गेंदबाजों को 5 सत्र देना चाहते थे भारत को ऑल आउट करने के लिए।

मार्टिन ने अगरकर की शॉर्ट गेंद को हुक करके स्क्वेयर लेग सीमारेखा की ओर भेजा और ऑस्ट्रेलिया की बढ़त 500 रन कर दी, मार्टिन 83 पर आ गए थे और गिलक्रिस्ट उनका शतक होते ही पारी घोषित करने वाले थे। माइकल क्लार्क के लिए यह अवसर अपने एकदिवसीय क्रिकेट वाले शॉट दिखाने का था। क्लार्क मात्र 95 गेंदों में 73 रन बनाकर कुम्बले की गेंद पर आउट हुए।

97 के स्कोर पर ज़हीर खान की गेंद मार्टिन के बल्ले का किनारा लेकर गेंद पार्थव पटेल के दस्तानों में चली गयी। ऐडम गिलक्रिस्ट ने पारी घोषित कर दी। ऑस्ट्रेलिया ने आज सुबह 20 ओवरों में 127 रन बना दिए थे।

543 रनों के लक्ष्य का पीछा कर रही भारतीय टीम से मैच जीतने की आशा कट्टर प्रशंसकों को भी नहीं होगी। नागपुर से लेकर विषुवत रेखा तक वर्षा का कोई अनुमान नहीं था।

1969 में बिल लॉरी के नेतृत्व में आई ऑस्ट्रेलियाई टीम ने टाइगर पटौदी की भारतीय टीम पर 5 टेस्ट मैचों की शृंखला में 3-1 से विजय प्राप्त की थी। उसके बाद 1979-80 में 6 टेस्ट मैच खेलने आई किम ह्यूज़्स की ऑस्ट्रेलियाई टीम 0-2 से पराजित हुई। 1986-87 में ऐलन बॉर्डर की टीम 3 मैचों की शृंखला 0-0 से बराबर करके गयी। 1996 में दिल्ली में हुए एकमात्र टेस्ट में मार्क टेलर की ऑस्ट्रेलिया को पराजय मिली। 1998 में भी मार्क टेलर की टीम 1-2 से हारी और 2001 में स्टीव वॉ की टीम भी 1-2 से पराजित होकर गयी थी।

54वें ओवर में शेन वॉर्न की तीसरी गेंद। ज़हीर खान ने स्लॉग स्वीप खेला, मिडविकेट सीमारेखा पर डेमियन मार्टिन के लिए आसान सा कैच। ऐडम गिलक्रिस्ट की टीम ने वह कर दिखाया था जो ऑस्ट्रेलियाई टीमें 35 वर्ष से नहीं कर सकी थीं।

निकट इतिहास में इस विजय की तुलना यदि किसी मैच से की जा सकती थी तो वह था सबाइना पार्क 1995, जहाँ ऑस्ट्रेलिया ने 22 वर्षों में पहली बार वेस्ट इंडीज़ को उसके घर में टेस्ट शृंखला में पराजित किया था। 1995 वाली शृंखला में चारों टेस्ट मैचों में ऑस्ट्रेलिया की एक ही एकादश खेली थी, 2004 बॉर्डर गावस्कर शृंखला में भी अबतक इन 3 टेस्ट मैचों में ऑस्ट्रेलिया ने एकादश में कोई परिवर्तन नहीं किया था।

“Here mate, this is for you too.”
ऐलन बॉर्डर वेस्ट इंडीज़ के विरुद्ध अपनी अंतिम शृंखला (1992-93) में विजय के निकट पहुँचे थे पर ऐडिलेड टेस्ट मात्र 1 रन से हारने के कारण शृंखला 1-2 से हार गए थे। मार्क टेलर की टीम ने जब 1995 में ऐतिहासिक शृंखला जीती तब बॉर्डर कॉमेंट्री कर रहे थे। ऐलन बॉर्डर का ड्रेसिंग रूम में स्वागत करते हुए मार्क टेलर कहा था, “Here mate, this is for you too.” कुछ इसी प्रकार आज गिलक्रिस्ट की टीम ने स्टीव वॉ को फोन पर व्यस्त रखा था। वॉ कप्तान रहते भारत में शृंखला नहीं जीत पाए थे पर आज उनके खिलाड़ियों ने “Final Frontier” जीत लिया था।

मैन ऑफ द मैच पुरस्कार के 3 दावेदार थे। जेसन गिलेस्पी ने इस पारी में 4 और मैच में 9 विकेट लिए थे। माइकल क्लार्क ने पहली पारी में 91 और दूसरी में तेज 73 रन बनाए थे। यह पुरस्कार मिला पहली पारी में 114 और दूसरी में 97 रन बनाने वाले डेमियन मार्टिन को, मार्टिन मुम्बई में मैन ऑफ द सीरीज भी चुने गए।

Australian Middle Order:
माइकल क्लार्क ने अबतक 3 मैचों में 75 की औसत से 376 रन बनाए थे और रिकी पॉन्टिंग की कमी खलने नहीं दी थी। डेमियन मार्टिन ने 65 की औसत से 389 रन बनाए थे। कैटिच ने लगभग 54 की औसत से 268 रन बनाए थे। वीरेंद्र सेहवाग के अतिरिक्त किसी अन्य भारतीय बल्लेबाज का प्रदर्शन उल्लेखनीय नहीं था। सेहवाग ने शृंखला में अबतक 57 की औसत से 286 रन बनाए थे। उनके अतिरिक्त केवल पार्थिव पटेल (156) ऐसे भारतीय बल्लेबाज थे, जिनके 150 से अधिक रन थे।

राहल द्रविड़ 3 मैचों में 21.8 की औसत से 109 रन,
लक्ष्मण 3 मैचों में 10.6 की औसत से 53 रन,
सौरव 2 मैचों में 19.67 की औसत से 59 रन,
सचिन 1 मैच में 5 की औसत से 10 रन।

दोनों टीमों के मध्यक्रमों के प्रदर्शन में जमीन आसमान का अंतर था और यह निर्णायक सिद्ध हुआ।

ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों की जितनी प्रशंसा की जाए कम थी। जेसन गिलेस्पी ने अबतक 3 मैचों में 15.43 की औसत से 16 विकेट लिए थे और मक्ग्रा ने 26.54 की औसत से 11. कैस्प्रोविच ने सहायक तेज गेंदबाज की भूमिका अच्छी निभाई थी। शेन वॉर्न ने 14 विकेट लिए थे। यह भारत में टेस्ट शृंखलाओं में उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था।

मुम्बई टेस्ट अब Dead Rubber था, इसके परिणाम का शृंखला पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना था। रिकी पॉन्टिंग फिट होकर ऑस्ट्रेलियाई एकादश में लौटे, नागपुर टेस्ट की पहली पारी में हैमस्ट्रिंग खिंचवा चुके डैरेन लीमन की जगह। शेन वॉर्न के अंगूठे में फ्रैक्चर था, अतः ऑफ स्पिनर नेथन नौरिट्ज़ को अपना पहला टेस्ट खेलने का अवसर मिला। भारतीय टीम में भी परिवर्तन हुए। शृंखला में कई कैच टपकाने वाले विकेटकीपर पार्थिव पटेल के स्थान पर दिनेश कार्तिक ने टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण किया और आकाश चोपड़ा को पुनः बाहर करके गौतम गंभीर को पदार्पण का अवसर दिया गया। अजित अगरकर के स्थान पर हरभजन वापस आए। भारत ने यह टेस्ट 13 रनों से जीता। मुरली कार्तिक मैन ऑफ द मैच रहे।

2004 बॉर्डर गावस्कर शृंखला पर क्रिकेट टेल्स की यह तीन पोस्ट की शृंखला यहीं समाप्त हुई। धन्यवाद।

साभार:

1. 1993 से 2008 तक की ऑस्ट्रेलियाई टीम पर लिखी गयी Malcolm Knox की पुस्तक “The Greatest”

2. Guardian में Anand Vasu का लेख “Flak flies as India suffer”

3. इंडिया टूडे में सितंबर 2004 में छपा लेख “BCCI president election process: A reminder of everything that is wrong with Indian cricket”

4. यूट्यूब हाइलाइट्स,

5. ESPN Cricinfo स्कोरकार्ड.

चित्र: Getty Images

2004: भारत में ऑस्ट्रेलिया की ऐतिहासिक टेस्ट शृंखला विजय – भाग 2 (चेन्नई)

चेन्नई टेस्ट पर चर्चा करने से पूर्व डेमियन मार्टिन पर बात करना आवश्यक है।

डेमियन मार्टिन भी अपने समय के माइकल क्लार्क थे। उनका टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण भी अल्पायु में हुआ था (मात्र 21 वर्ष में)। उन्हें भी ऑस्ट्रेलियन क्रिकेट का भविष्य कहा जा रहा था परंतु उनके करियर का आरंभ माइकल क्लार्क की भाँति नहीं हुआ था। 1992-93 में वेस्ट इंडीज़ के विरुद्ध उन्होंने अपने टेस्ट करियर का आरंभ किया था और शृंखला के 4 टेस्ट में मात्र 169 रन बनाए।

1993-94 में दक्षिण अफ्रीका ऑस्ट्रेलिया दौरे पर आई तो स्टीव वॉ की चोट के कारण मार्टिन को एकादश में स्थान मिला। मेलबर्न में पहला टेस्ट वर्षा के कारण बराबर रहा और सिडनी में दूसरे टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया चौथी पारी में दक्षिण अफ्रीका के सामने 117 रनों के लक्ष्य का पीछा कर रही थी। चौथे दिन का खेल समाप्त होने तक ऑस्ट्रेलिया ने 4 विकेट पर 63 रन बना लिए थे। अंतिम दिन ऑस्ट्रेलिया ने मात्र 12 रन पर 4 विकेट और गँवा दिए और स्कोर 75 पर 8 हो गया।

क्रमांक 10 पर आए तेज गेंदबाज क्रेग मैक़्डर्मट। मैक़्डर्मट क्रमांक 10 केवल इसलिए थे क्योंकि क्रमांक 11 अब ग्लेन मक्ग्रा ने हथिया लिया था जो निश्चित रूप से उनसे घटिया बल्लेबाज़ थे। पर आज के दिन मैक़्डर्मट एक बल्लेबाज की भाँति खेल रहे थे। उन्होंने ऐलन डॉनल्ड और फैनी डिविलियर्स को चार चौके लगाकर स्कोर को 110 तक पहुँचाया। मात्र 7 रन चाहिए थे विजय के लिए, रन बनाने का दायित्व मैक़्डर्मट ने अपने ऊपर लिया हुआ था। अबतक 35 की साझेदारी में 29 रन बनाने वाले मैक़्डर्मट इस प्रकार खेल रहे थे मानो बस स्ट्राइक मिलते ही विजय दिला देंगे। कहने को दो विकेट शेष थे पर नम्बर 11 ग्लेन मक्ग्रा से ऐसी स्थिति में एक रन बनाने की आशा रखना भी समझदारी नहीं थी।

डेमियन मार्टिन एकमात्र विशेषज्ञ बल्लेबाज शेष थे, पहली पारी में उन्होंने 59 रन बनाए थे पर दूसरी पारी में एक एक रन के लिए संघर्ष कर रहे थे। वे टीम के सबसे युवा सदस्य थे पर आज अबतक सबसे अधिक साहस उन्होंने ही दिखाया था। उन्होंने आज सुबह 4 अनुभवी खिलाड़ियों के विकेट गिरते देखे थे पर वे डटे हुए थे। अब अधिक देर का संघर्ष शेष नहीं था। इस बात से कोई अंतर पड़ने वाला नहीं था कि उन्होंने अबतक लगभग 2 घण्टे बल्लेबाजी करके 58 गेंदों में 6 रन बनाए थे। उन्हें बस थोड़ी देर और खड़ा रहना था।

“But sometimes the brink is a precipice.” ऑस्ट्रेलिया विजयद्वार पर खड़ी थी। मार्टिन स्वभाव से एक आक्रामक बल्लेबाज थे पर आज उन्होंने स्वयं पर बहुत नियंत्रण रखा था। उन्हें ऐलन डॉनल्ड की एक गेंद हाफ वॉली लगी। मार्टिन ने अपना स्वाभाविक खेल खेला और ड्राइव के लिए गए पर ये हाफ वॉली नहीं थी, मार्टिन गेंद की पिच तक नहीं पहुँचे थे पर उनका बल्ला चल चुका था। सम्पर्क ठीक नहीं हुआ और गेंद एक्सट्रा कवर पर खड़े ऐन्ड्रू हडसन के सुरक्षित हाथों में चली गयी।

ग्लेन मक्ग्रा मात्र 1 रन बनाकर फैनी डिविलियर्स को रिटर्न कैच दे बैठे, क्रेग मैक़्डर्मट दूसरे छोर पर 29 पर खड़े रह गए और दक्षिण अफ्रीका ने यह मैच 5 रनों से जीत लिया। [ऐडिलेड टेस्ट में स्टीव वॉ वापस आए और उनकी 164 रनों की पारी के बलपर ऑस्ट्रेलिया ने टेस्ट जीतकर शृंखला 1-1 से बराबर की।]

जहाँ टेस्ट मैच दाँव पर लगा हो वहाँ ऑस्ट्रेलियाई टीम में ऐसी लापरवाही और अनुशासनहीनता स्वीकार्य नहीं थी। इस एक अनावश्यक शॉट ने डेमियन मार्टिन का टेस्ट करियर 7 वर्ष छोटा कर दिया। मार्टिन को इस पराजय का ऐसा दंड मिलना चाहिए था या नहीं उसपर आप विचार करें। क्या वे पराजय के लिए अकेले उत्तरदायी थे?

“History reserves it’s strongest condemnation for great talent frittered away” – मार्टिन जैसी नैसर्गिक प्रतिभा वाले बल्लेबाज बहुत कम देखने को मिले हैं। जो कठिन शॉट को भी इस प्रकार खेल सकते थे जो देखने वाले को ऐसा लगे कि यह तो बड़ा सरल है।

मार्टिन का दुर्भाग्य यह नहीं था कि उन्होंने यह शॉट खेला प्रत्युत उनके खेलने की शैली ऐसी थी कि ऐसा लगा मानो उन्होंने इस बात की चिंता नहीं की कि ऑस्ट्रेलिया को मात्र 7 रन चाहिए। उन्होंने बॉर्डर, मार्क वॉ, इयन हीली और शेन वॉर्न अपने सामने आउट होकर लौटते देखा था और टीम को लक्ष्य के इतना निकट तक पहुँचाने में उनसे अधिक श्रम किया था परन्तु इस एक शॉट के कारण यह बात किसी को याद नहीं रहनेवाली थी।

मार्टिन को अगला टेस्ट खेलने का अवसर लगभग 7 वर्ष बाद 29 वर्ष की आयु में नवम्बर 2000 में मिला। अबकी बार उन्होंने अपना स्थान सुनिश्चित कर किया और इसके बाद टीम का हिस्सा बने रहे।

2001 में भी भारत में हुई शृंखला हेतु उन्हें टीम में रखा गया था पर रिकी पॉन्टिंग की लगातार खराब फॉर्म के बाद भी एकादश में स्थान नहीं मिला था।

2004 में वे ऑस्ट्रेलियाई मध्यक्रम के सबसे महत्वपूर्ण स्तम्भ सिद्ध होने वाले थे। अबतक इस शृंखला में उन्होंने कोई उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं किया था। चेन्नई में टेस्ट का तीसरा ही दिन था और दूसरी पारी में उनकी टीम संकट में थी। अभी भी 20 रन की बढ़त उतारनी थी और तीन प्रमुख बल्लेबाज पवेलियन लौट चुके थे। ऑस्ट्रेलिया को आवश्यकता थी एक नायक की, जो उसे मार्टिन के रूप में मिला।

चलते हैं 3 दिन पूर्व चेन्नई टेस्ट के पहले दिन:

1-0 की बढ़त के साथ ऑस्ट्रेलिया चेन्नई पहुँची। 2001 वाली शृंखला में भी ऑस्ट्रेलियाई टीम के पास 1-0 की बढ़त थी पर अगले दोनों टेस्ट गँवाकर वह शृंखला 1-2 से हार गई थी।

चेन्नई में भारत ने ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध पिछले दोनों टेस्ट मैच (1998 और 2001) जीते थे। भारतीय टीम को 2004 में भी ऐसे ही परिणाम की अपेक्षा थी। चिंता की बात यह थी कि उन दोनों मैचों में शतक लगाने वाले सचिन तेंदुलकर चोट के कारण एकादश में नहीं थे।

Australia off to a flier:
ऐडम गिलक्रिस्ट ने पुनः टॉस जीता और बल्लेबाजी का निर्णय लिया और उनके आरंभिक बल्लेबाजों मैथ्यू हेडन और जस्टिन लैंगर ने इस निर्णय को उचित सिद्ध किया। मैथ्यू हेडन ने 2001 चेन्नई टेस्ट में दोहरा शतक लगाया था, 2004 में भी वे वैसा ही प्रदर्शन दोहराने को तैयार लग रहे थे। प्रथम सत्र में कोई विकेट नहीं गिरा और 111 रन बन गए थे। दोनों बल्लेबाज अपने अर्धशतक बना चुके थे और साढ़े चार की औसत से रन बना रहे थे। कप्तान सौरव गांगुली को पहले ही सत्र में सीमारेखा पर क्षेत्ररक्षक लगाने को विवश होना पड़ा था। भोजनावकाश के बाद मैथ्यू हेडन ने हरभजन सिंह की गेंद पर आगे निकलकर छक्का लगाना चाहा। वे अबतक दो छक्के लगा चुके थे पर इस बार सम्पर्क सही नहीं हुआ और गेंद लॉन्ग ऑफ पर लक्ष्मण के हाथों में चली गयी। दो गेंद बाद हरभजन ने लैंगर को स्लिप में द्रविड़ के हाथों कैच कराया और मैच में भारतीय टीम की वापसी करा दी।

Jumbo: चायकाल से ठीक पूर्व अनिल कुंबले ने डेमियन मार्टिन को फॉरवर्ड शॉर्ट लेग पर कैच कराके तीसरे विकेट के लिए 53 रनों की साझेदारी का अंत किया। चायकाल के बाद तो कुंबले ने मानो लाइन लगा दी। उन्होंने पारी में 7 विकेट लिए ऑस्ट्रेलिया मात्र 235 रनों पर सिमट गयी। (अंतिम 8 विकेट मात्र 46 रनों पर) अनिल कुंबले ने 17.3 ओवर में 48 रन देकर 7 विकेट लिए।

आकाश चोपड़ा को एकादश में स्थान नहीं मिला था, उनके स्थान पर मोहम्मद कैफ को अवसर मिला था। वीरेंद्र सहवाग के साथ उतरे युवराज सिंह जो 40 गेंदों तक संघर्ष करते रहे और इस संघर्ष का अंत किया शेन वॉर्न ने, जब उनकी गेंद युवराज के बल्ले का किनारा लेती हुई गिलक्रिस्ट के पैरों में फँस गयी।

The Virender Sehwag Show:
वीरेंद्र सेहवाग ने 2003 बॉक्सिंग डे टेस्ट में मेलबर्न में 195 रनों की पारी खेली थी। चेन्नई टेस्ट के दूसरे दिन टीम को उनसे ऐसी ही पारी की आवश्यकता थी। गिलेस्पी को स्क्वेयर लेग पर चौका लगाकर उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में अपने 2 हज़ार रन पूरे किए। पहले दिन रात्रि प्रहरी के रूप में आए इरफान पठान ने एक छोर संभाला हुआ था और रन बनाने का दायित्व सेहवाग पर था। शेन वॉर्न को स्वीप करके उन्होंने अपना अर्धशतक पूर्ण किया। यह उनका 9वाँ चौका था। भोजनावकाश से कुछ ओवर पूर्व इरफान आउट हुए और राहुल द्रविड़ क्रीज पर आए।

इस साझेदारी में द्रविड़ की भूमिका भी वही थी जो पिछली साझेदारी में इरफान की थी, बस एक छोर पर खड़े रहो और “वीरेन्द्र सेहवाग शो” का आनंद लो, क्योंकि कोई भी वीरेंद्र सेहवाग की तरह टेस्ट नहीं खेल सकता। सेहवाग जब लय में होते हैं तो उनके साथी बल्लेबाज की भूमिका यही होती है, चाहे वह मेलबर्न या लाहौर में राहुल द्रविड़ हों या मुल्तान में सचिन तेंदुलकर हों। (अब इस बात पर कोई धनुष पर प्रत्यंचा न चढ़ा ले कि मुल्तान में सचिन ने 194* और लाहौर में द्रविड़ ने 128* बनाए थे, यहाँ बस साझेदारी में वीरू के आक्रामक होने की बात हो रही है।)

56वें ओवर में माइकल कैस्प्रोविच की गेंद को बैकवर्ड पॉइंट सीमारेखा के बाहर भेजकर सेहवाग 99 पर पहुँचे और तीन गेंद बाद ही एक्स्ट्रा कवर पर चौका लगाकर उन्होंने अपना 7वाँ टेस्ट शतक पूरा किया। (इस समय टीम का स्कोर था 160 रन।)

Middle order struggles:
चायकाल से पहले राहुल द्रविड़ 26 रन बनाकर आउट हुए। ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध पिछली दोनों शृंखलाओं में अविस्मरणीय प्रदर्शन करने वाले राहुल द्रविड़ का लगातार दूसरे टेस्ट में असफल होना चिंताजनक था।

क्रीज पर द्रविड़ की जगह ली कप्तान सौरव गांगुली ने। 2001 वाली शृंखला भारत ने उनकी कप्तानी में जीती थी पर उसमें वे 6 पारियों में मात्र 106 रन बना सके थे। वे बैंगलोर टेस्ट में हुए पिछले टेस्ट में भी प्रभावी नहीं लगे थे। कप्तान की फॉर्म भारतीय टीम के लिए चिंता का विषय थी। आज भाग्य भी उनका साथ दे रहा था, इसके बाद भी वे इसका लाभ नहीं उठा सके। शून्य के स्कोर पर माइकल कैस्प्रोविच की गेंद पर वे तीसरी स्लिप में कैच हुए पर अम्पायर रूडी कोर्टजन ने नो बॉल का संकेत दिया। कुछ समय बाद कैस्प्रोविच की ही गेंद पर गिलक्रिस्ट ने उनका सरल सा कैच छोड़ दिया था। जेसन गिलेस्पी ने क्रीज पर उनके 29 गेंदों तक चले संघर्षपूर्ण प्रवास का अंत किया। कप्तान मात्र 9 रन बना सके। राहुल द्रविड़ की तरह पिछली दोनों शृंखलाओं के नायक रहे वीवीएस लक्ष्मण भी अधिक देर नहीं टिके और जेसन गिलेस्पी ने उनका ऑफ स्टम्प उड़ा दिया।

विकेटों के पतन के बीच वीरेंद्र सेहवाग दूसरे छोर पर अपने काम में लगे हुए थे। वे अपने डेढ़ सौ रन पूरे कर चुके थे। भारत अब ऑस्ट्रेलिया के स्कोर से मात्र 2 रन पीछे था। यह सर्वविदित था कि वीरेन्द्र सेहवाग अच्छी से अच्छी गेंद पर चौका लगा सकते हैं पर घटिया से घटिया गेंद पर विकेट भी दे सकते हैं। हुआ भी यही। जिस प्रकार सेहवाग मेलबर्न में 195 बनाने के बाद साइमन कैटिच की फुलटॉस पर आउट हुए थे, कुछ उसी प्रकार चेन्नई में भी उन्होंने 155 बनाने के बाद शेन वॉर्न की एक शॉर्ट गेंद को मिडविकेट सीमारेखा से थोड़ा अंदर खड़े माइकल क्लार्क के हाथों में भेज दिया। सेहवाग भारतीय टीम के कुल स्कोर का दो तिहाई अकेले बनाकर पवेलियन लौट रहे थे।

भारत को इस पिच पर चौथी पारी खेलनी थी अतः एक बड़ी बढ़त आवश्यक थी पर सारे बड़े नाम वापस लौट चुके थे। यहाँ बढ़त दिलाने का दायित्व उठाया चोट के बाद वापसी कर रहे युवा बल्लेबाज मोहम्मद कैफ और विकेटकीपर पार्थव पटेल ने। दोनों ने अर्धशतक बनाए और 40 ओवरों में 102 रनों की साझेदारी की। भारतीय पारी 141 रनों की बढ़त के साथ 376 पर समाप्त हुई।

अनिल कुंबले ने दोनों आरंभिक बल्लेबाजों को आउट किया और जब साइमन कैटिच इरफान पठान की गेंद पर आउट हुए तब ऑस्ट्रेलिया 20 रन पीछे थी। क्रीज पर आए डेमियन मार्टिन।

तीसरे दिन का खेल समाप्त होने से ठीक पूर्व अनिल कुंबले ने ऐडम गिलक्रिस्ट को 49 के स्कोर पर बोल्ड कर दिया और रात्रि प्रहरी के रूप में आए जेसन गिलेस्पी। यह अनिल कुंबले का मैच में 10वाँ विकेट था। टेस्ट क्रिकेट में उन्होंने 6ठी बार मैच में 10 विकेट पूरे किए थे। दिन का खेल समाप्त होने पर ऑस्ट्रेलिया का स्कोर था 49 ओवर में 150/4.

Martyn Masterclass:
चौथे दिन के पहले घण्टे में मार्टिन और गिलेस्पी केवल भागकर ही रन लिए। मार्टिन ने कुंबले की शॉर्ट गेंद पर पुल करके स्क्वेयर लेग क्षेत्र में दिन का पहला चौका प्राप्त किया। पारी के 73वें ओवर में हरभजन की शॉर्ट गेंदों पर मिडविकेट क्षेत्र में लगातार दो चौका लगाकर मार्टिन ने अपना 18वाँ अर्धशतक पूरा कर लिया और भोजनावकाश तक ऑस्ट्रेलिया का एक भी विकेट नहीं गिरने दिया। जेसन गिलेस्पी आए तो रात्रि प्रहरी की भूमिका में थे परंतु उन्होंने आज एक छोर सम्भाले रखा था।

गेंद रफ में गिरने के बाद कितना उछलेगी इसका अनुमान लगाना कठिन था अतः मार्टिन अधिकतर बैकफुट पर ही खेल रहे थे। पिछली पारी में कुंबले की गेंद को फ्रंट फुट पर खेलने के प्रयास में वो शॉर्ट लेग पर कैच हो गए थे।

भोजनावकाश के बाद सौरव गांगुली ने नई गेंद ले ली। इरफान पठान को पॉइंट पर चौका लगाकर मार्टिन ने इस साझेदारी के सौ रन पूरे कर लिए। बढ़त भी सौ से अधिक हो गयी थी जो सौरव के लिए चिंता का विषय बनती जा रही थी। मार्टिन अब रफ में गिर रही गेंदों पर स्वीप खेलने का विचार किया था। इसी शॉट द्वारा हरभजन सिंह को लगातार दो चौके लगाकर वे 90 के पार पहुँच गए।

One of the finest test hundreds vs India: पारी के 100वें ओवर कुंबले की पहली पाँच गेंदों को मार्टिन के रक्षात्मक ढंग से खेला और अंतिम गेंद को आगे निकलकर सीधा उठा दिया। अम्पायर डेविड शेफर्ड के दोनों हाथ ऊपर। टेस्ट क्रिकेट में मार्टिन का यह 8वाँ और भारत के विरुद्ध पहला शतक था। शतक के तत्काल बाद ही हरभजन की गेंद पर वे स्लिप में कैच दे बैठे। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया को न केवल संकट से उबारा था बल्कि चौथी पारी में भारत के लिए बड़ा लक्ष्य प्राप्त करने की ओर अग्रसर कर दिया था। 43-44 डिग्री की गर्मी में स्पिन के लिए आदर्श परिस्थितियों पिच पर विश्व क्रिकेट के दो श्रेष्ठ स्पिन गेंदबाजों के विरुद्ध मार्टिन की यह पारी ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट इतिहास की अविस्मरणीय पारियों में से एक है। 4 घंटे से खेल रहे गिलेस्पी भी मानो मार्टिन के साथ देने के लिए ही रुके हुए थे, वे भी इसी ओवर में स्लिप में ही कैच हुए। स्कोर 285/6, ऑस्ट्रेलिया की बढ़त 144 रन।

माइकल क्लार्क और डैरेन लीमन (31) के बीच 62 रनों की साझेदारी हुई। दिन का खेल समाप्त होने से कुछ मिनट पूर्व ऑस्ट्रेलियाई पारी 369 रनों पर समाप्त हुई। क्लार्क 39 पर अविजित रहे। अनिल कुंबले ने पारी में 6 विकेट लिए (मैच में 13)। आज उनका जन्मदिन भी था।

229 रनों के लक्ष्य का पीछा करने उतरी भारतीय टीम ने 3 ओवरों में 19 रन बनाए। दोनों आरंभिक बल्लेबाज सेहवाग और युवराज अविजित लौटे।

चौथी पारी में इस पिच पर 200 से अधिक का लक्ष्य प्राप्त करना बहुत कठिन था। वह भी तब जब पिच पर पिच पर रफ बन चुके थे और शेन वॉर्न लय में थे। निश्चित रूप से पलड़ा ऑस्ट्रेलिया का ही भारी था पर भारतीय टीम भी मैच से बाहर नहीं थी। मैच का परिणाम क्या रहा होता इसका केवल अनुमान ही लगाया जा सकता था क्योंकि पाँचवे और अंतिम दिन वर्षा के कारण एक गेंद भी नहीं फेंकी गई।

मैच बराबर रहा और ऑस्ट्रेलिया की शृंखला में 1-0 की बढ़त बनी रही। 13 विकेट लेने वाले अनिल कुंबले मैन ऑफ द मैच रहे।

भारतीय टीम यह सोचकर प्रसन्न हो सकती थी कि वीरेंद्र सेहवाग फॉर्म में लौटे थे। युवा बल्लेबाज मोहम्मफ कैफ और पार्थव पटेल ने भी अच्छे अर्धशतक बनाए थे। ऑस्ट्रेलिया के लिए शेन वॉर्न की गेंदबाजी और मार्टिन का शतक प्रसन्न करने वाली बात थी। भारतीय टीम के लिए कप्तान सौरव गांगुली, उपकप्तान राहुल द्रविड़ और VVS लक्ष्मण की फॉर्म चिंता का विषय थी।

ऑस्ट्रेलियाई कप्तान ऐडम गिलक्रिस्ट ने कहा कि यह तो सबको ज्ञात था कि WACA (पर्थ) में लम्बे समय तक खेल चुके मार्टिन तेज गेंदबाजी खेलने में दक्ष हैं पर इस वर्ष (2004) उन्होंने श्रीलंका में मुथैया मुरलीधरन एवं भारत में अनिल कुंबले और हरभजन के विरुद्ध शतक लगाकर यह सिद्ध कर दिया है कि वे एक पूर्ण बल्लेबाज हैं, स्पिन और पेस दोनों के विरुद्ध सिद्धहस्त।

नागपुर टेस्ट 8 दिन बाद आरम्भ होना था। इसकी चर्चा अगले भाग में।

साभार-

  1. 1993 से 2008 तक की ऑस्ट्रेलियाई टीम पर लिखी गयी Malcolm Knox की पुस्तक “The Greatest”
  2. यूट्यूब हाईलाइट्स
  3. ESPN CricInfo Scorecard

चित्र: Getty Images

2004: भारत में ऑस्ट्रेलिया की ऐतिहासिक टेस्ट शृंखला विजय- भाग 1

सिडनी 2004 महान स्टीव वॉ के करियर का अंतिम टेस्ट मैच था। अंतिम दिन वॉ की 80 रनों की पारी ने यह मैच ड्रॉ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बॉर्डर- गावस्कर शृंखला 1-1 की बराबरी पर समाप्त हुई। चूँकि भारत ने 2001 में हुई शृंखला 2-1 से जीती थी, अतः ट्रॉफी भारत के पास ही रही।

ऐलन बॉर्डर और मार्क टेलर की भाँति स्टीव भी अपने टेस्ट करियर का समापन अपनी शर्तों पर कर रहे थे। जैसे ही उन्हें लगा कि टीम उनके बिना आगे बढ़ सकती है और उनका रहना टीम की प्रगति में बाधक होगा, उन्होंने सन्यास लेना उचित समझा।

शीर्ष पर पहुँचना कठिन है पर उससे भी कठिन है शीर्ष पर बने रहना। एक टीम को सदैव प्रेरित रखने, उसकी विजय की भूख बनाए रखने के लिए जीतते रहना पर्याप्त नहीं है। रचनात्मक कप्तानी और नए विचारों का संचार होना आवश्यक है। स्टीव वॉ ने मार्क टेलर से एक सशक्त टीम प्राप्त की थी और इसे अपराजेय बना दिया था। उनके कार्यकाल में ऑस्ट्रेलिया ने टेस्ट मैच में एक दिन में 350 से अधिक रन लगातार बनाए (कुछेक अपवादों को छोड़कर), दो बार 400 से अधिक रन बनाए।

स्टीव वॉ ने इतिहास से सीखा था, उन्होंने महान खिलाड़ियों के सन्यास के उपरांत वेस्ट इंडीज़ की महान टीम का पतन होते देखा था, इसीलिए उन्होंने भविष्य पर भी ध्यान दिया था और लगातार आवश्यक परिवर्तन किए, नए खिलाड़ियों को अवसर दिए (*यह कप्तान का काम है। ऐसा करके वह किसी पर कृपा नहीं करता)। निश्चित रूप से वे भाग्यशाली भी रहे कि उनके पास योग्य खिलाड़ी आते रहे। एक कप्तान कितनी भी योजनाएँ बना ले, बिना सक्षम खिलाड़ियों के उन योजनाओं का सफल क्रियान्वयन सम्भव नहीं है।

ऑस्ट्रेलियाई मध्यक्रम 2001 की तुलना में पूरा बदला हुआ था। मार्क वॉ और स्टीव वॉ सन्यास ले चुके थे और रिकी पॉन्टिंग चोटिल थे। स्टीव वॉ के सन्यास के पश्चात डैरेन लीमन ऑस्ट्रेलियाई मध्यक्रम का हिस्सा बने हुए थे, वे स्टीव वॉ के नम्बर (5) पर खेल रहे थे और अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे। मार्च 2004 में श्रीलंका में हुई टेस्ट शृंखला में 2 शतक लगाए थे और कोलंबो में अंतिम टेस्ट जीतकर शृंखला 3-0 से जीतने में उनकी 153 रनों की पारी की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका थी। अबतक 21 टेस्ट मैचों के करियर में उन्होंने 51.63 की औसत से डेढ़ हजार से अधिक रन बनाए थे। रिकी पॉन्टिंग की अनुपस्थिति में वे इस ऑस्ट्रेलियाई टीम के उपकप्तान बनाए गए थे।

साइमन कैटिच ने अबतक मात्र 9 टेस्ट मैच खेले थे। जिसमें से 4 भारत के विरुद्ध थे (भारत के ऑस्ट्रेलिया दौरे पर)। सिडनी (स्टीव वॉ का अंतिम टेस्ट) में उन्होंने पहली पारी में शतक बनाया था और दूसरी पारी में उनके 77 अविजित रनों की पारी की मैच ड्रॉ कराने में महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। यही कारण था जुलाई 2004 में श्रीलंका के विरुद्ध हुई 2 टेस्ट की श्रृंखला में वे पूरी तरह विफल रहने पर भी चयनकर्ताओं ने भारत दौरे के लिए उन्हें टीम में चुना। (2004 में ऑस्ट्रेलिया और श्रीलंका के मध्य 5 टेस्ट हुए थे, 3 श्रीलंका में मार्च में और 2 ऑस्ट्रेलिया में जुलाई में)

डेमियन मार्टिन 2001 ऐशेज शृंखला से ऑस्ट्रेलियाई टीम का महत्वपूर्ण हिस्सा बने हुए थे। मार्क वॉ के सन्यास के बाद उन्हें मार्क वॉ के नम्बर (4) पर खेलने का अवसर मिला। मार्क की तरह ही वे एक दर्शनीय बल्लेबाज थे। श्रीलंका में हुई शृंखला में उन्होंने 2 शतक लगाए थे, जिसमें से कैंडी में दूसरे टेस्ट की दूसरी पारी में लगाया गया उनका शतक (161) उनके करियर की सर्वश्रेष्ठ पारियों में से एक रहा। रिकी पॉन्टिंग की अनुपस्थिति में अनिल कुम्बले और हरभजन सिंह के विरुद्ध ऑस्ट्रेलियाई मध्यक्रम को संभालने का दायित्व उनपर ही था। मार्टिन ने कह दिया था कि हाफ़ वॉली के अतिरिक्त स्पिन गेंदबाजों की गेंदों को वे बैकफुट पर ही खेलेंगे। श्रीलंका में उन्होंने यही किया था। मुरलीधरन और उपुल चंदना को उन्होंने जिस कौशल से खेला था, वह अद्भुत था।

Kid from Western Suburbs of Sydney: ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट के “Next big thing” कहे जा रहे 23 वर्षीय माइकल जॉन क्लार्क का नाम भारतीय क्रिकेट टीम ने लिए अनसुना नहीं था। क्लार्क ने अबतक 34 एकदिवसीय मैच खेले थे और 41 की औसत से 900 रन बना चुके थे। उन्होंने 2003 में भारत में हुई एकदिवसीय त्रिकोणीय शृंखला भी खेली थी। भारतीय टीम जब ऑस्ट्रेलिया दौरे पर गयी थी तो तीन दिवसीय दिवसीय अभ्यास मैच में ऑस्ट्रेलिया- “ए” के लिए खेलते हुए क्लार्क ने 131 अविजित रन (मात्र 140 गेंदों में) बनाए थे।

2004 के भारत दौरे के लिए जब माइकल क्लार्क का ऑस्ट्रेलियाई टीम में चयन हुआ तब आशा यही की गई थी कि वे टेस्ट टीम के साथ रहकर अनुभव प्राप्त करेंगे। इस टेस्ट शृंखला से ठीक पूर्व इंग्लैंड में हुई ICC चैंपियंस ट्रॉफी में कप्तान रिकी पॉन्टिंग के अंगूठे में चोट लग गयी और बैंगलोर में प्रथम टेस्ट की एकादश में माइकल क्लार्क को स्थान मिलने की पूरी संभावना बन गयी।

क्लार्क की प्रथम श्रेणी औसत 40 से कम थी, इस कारण उनके चयन पर आलोचनाओं के स्वर मुखर हुए। विक्टोरिया के ब्रैड हॉज को भी टीम में सम्मिलित किया गया था और यह चर्चाएँ भी थीं कि वे पॉन्टिंग के स्थान पर नम्बर 3 पर खेल सकते हैं। ब्रेबोर्न स्टेडियम में मुंबई के विरुद्ध अभ्यास मैच में माइकल क्लार्क ने 52 रनों की पारी खेली और टीम प्रबंधन ने निर्णय लिया कि बैंगलोर में प्रथम टेस्ट में क्लार्क ही एकादश का हिस्सा होंगे। टीम प्रबंधन को अब यह विचार करना था कि नम्बर 3 (पॉन्टिंग का नम्बर) पर कौन खेलेगा, क्लार्क में क्षमता तो थी परंतु उनके पहले ही टेस्ट में उन्हें नम्बर 3 पर भेजना कप्तान और कोच को उचित नहीं लगा। निर्णय यह हुआ कि माइकल क्लार्क 6 पर खेलेंगे और साइमन कैटिच नम्बर 3 पर।

ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजी क्रम में अन्य तीन प्रमुख नाम थे, आरंभिक बल्लेबाज जस्टिन लैंगर और मैथ्यू हेडन और विकेटकीपर बल्लेबाज कार्यवाहक कप्तान ऐडम गिलक्रिस्ट।

ऑस्ट्रेलियाई टीम ने भारत में दो स्पिनर एकादश में रखने के स्थान पर इस बार अपनी ताकत अर्थात तेज गेंदबाजी को ही सशक्त रखने की योजना बनाई थी। ग्लेन मक्ग्रा और जेसन गिलेस्पी के साथ तीसरे तेज गेंदबाज थे माइकल कैस्प्रोविच, जिन्हें टीम प्रबंधन ने भारतीय परिस्थितियों हेतु ब्रेट ली से बेहतर समझा था। स्पिन का भार शेन वॉर्न के ऊपर, जिन्होंने एक वर्ष का प्रतिबंध पूरा करने के बाद श्रीलंका में हुई शृंखला में 20 की औसत से 26 विकेट लिए थे। भारत में अभी तक शेन वॉर्न को कोई विशेष सफलता नहीं मिली थी और यह निश्चित रूप से भारत में उनकी अंतिम टेस्ट शृंखला थी।

ऑस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाजों की लाइन सामान्यतया चौथे और पाँचवे स्टंप पर होती है ताकि बल्लेबाजी को विकेट के पीछे कैच कराया जा सके, पर ऐसा करने से बोल्ड और एलबीडबल्यू की संभावनाएं अल्प हो जाती हैं। अतः भारत दौरे पर उन्होंने तय किया था कि लेग साइड में अतिरिक्त क्षेत्ररक्षक रखकर विकेट टू विकेट गेंदबाजी की जाए। भारतीय बल्लेबाज अपने पैरों पर की गई गेंदों को अच्छा खेलते हैं पर इन शॉट्स पर उन्हें रन न मिले तो वो कुछ अतिरिक्त करने का प्रयास करेंगे और आउट होने की संभावना बढ़ेगी।

6 अक्टूबर 2004: चिन्नास्वामी स्टेडियम, बैंगलोर में ऐडम गिलक्रिस्ट ने टॉस जीता और किसी को कोई संदेह नहीं था कि वे क्या करने वाले हैं। जस्टिन लैंगर स्ट्राइक पर। इरफान पठान की पहली गेंद अंदर आई और लैंगर के पैड पर लगी। बहुत जोर की अपील परंतु अम्पायर बिली बाउडेन की उंगली नहीं उठी।

हेडन बिल्कुल 2001 वाली लय में ही दिख रहे थे। उन्होंने लैंगर के साथ 50 रनों की साझेदारी कर ली थी। कप्तान सौरव गांगुली ने हरभजन सिंह को आक्रमण पर लगाया, स्क्वेयर लेग सीमारेखा से थोड़ा अंदर युवराज सिंह को खड़ा करके। हेडन स्लॉग स्वीप के लिए गए, बल्ले और गेंद का सम्पर्क ठीक नहीं और गेंद युवराज सिंह के हाथों में। हेडन के विकेट के बाद लैंगर और कैटिच के बीच एक और साझेदारी पनपी और स्कोर 100 के पार हो गया। लैंगर ने अपना 21वाँ अर्धशतक पूरा किया और उसके बाद इरफान पठान की गेंद पर बोल्ड हो गए। अनिल कुंबले ने डेमियन मार्टिन को फॉरवर्ड शॉर्ट लेग और लीमन को पहली स्लिप में कैच कराया और 399 टेस्ट विकेट तक जा पहुँचे।

माइकल क्लार्क ने आज सवेरे शेन वॉर्न के हाथों अपनी “बैगी ग्रीन कैप” प्राप्त की थी। जब वे क्रीज पर आए तो स्कोर था 149 रन पर चार विकेट। अनिल कुंबले अपने 400वें विकेट की खोज में। पूरा स्टेडियम उनके साथ। टेस्ट क्रिकेट में क्लार्क पहली गेंद खेलने को तैयार। कुंबले की गूगली, सीधे पैड पर, तेज अपील परंतु नो-बॉल का संकेत।

अपना पहला रन लेने के बाद माइकल क्लार्क को बहुत समय नहीं लगा रंग में आने में। वे टेस्ट क्रिकेट के लिए पूर्ण रूप से तैयार थे। उनका फुटवर्क उच्चस्तरीय और दुविधा-मुक्त था। शॉर्टपिच गेंदों पर वे पूरी तरह बैकफुट पर जाकर पुल और कट रहे थे। आगे फेंकी गई गेंदों पर वे आगे निकलकर कवर की दिशा में ड्राइव कर रहे थे। ऐसा बिल्कुल नहीं लग रहा था कि यह बल्लेबाज अपना पहला टेस्ट खेल रहा है। जब भी उनके बल्ले का संपर्क गेंद से हो रहा था, ऑस्ट्रेलियाई समर्थकों के लिए वह ध्वनि कर्णप्रिय थी। क्लार्क ने अपना अर्धशतक 99 गेंदों पूरा कर लिया था।

“Breath of fresh air”
80वें ओवर में अनिल कुंबले की पहली गेंद। अराउंड द विकेट से, लेग स्टम्प के काफी बाहर पिच हुई, माइकल क्लार्क ने आगे निकलकर गेंद को सीधा उठा दिया। कॉमेंट्री बॉक्स में डीन जोन्स के शब्द “Oh.. is he a breath of fresh air!”

Number 400 for the great man: अनिल कुंबले अराउंड द विकेट से शॉर्ट गेंद। चौका या छक्का डिजर्व करती हुई। कैटिच ने बिल्कुल यही करने का प्रयास किया। बैकफुट पर जाकर पुल करने का प्रयास, गेंद हैंडल से लगकर उनके थाई-पैड पर गिरी और उसके बाद गिल्ली पर। अनिल कुंबले के चार सौ विकेट पूरे। टेस्ट क्रिकेट में 400 विकेट पूरे करने वाले तीसरे स्पिनर और दूसरे भारतीय गेंदबाज बन गए। कैटिच ने 81 रनों की अति-महत्वपूर्ण पारी खेली थी।

Unstoppable Gilchrist: साइमन कैटिच के आउट होने के पश्चात क्रीज पर आए ऐडम गिलक्रिस्ट ने हरभजन सिंह को चौका लगाकर अपना खाता खोला और दिन का खेल समाप्त होने तक क्लार्क के साथ मिलकर स्कोर को 90 ओवर में 5 विकेट पर 316 तक पहुँचा दिया। क्लार्क 76 और गिलक्रिस्ट 35 पर खेल रहे थे। आज का दिन पूर्ण रूप से ऑस्ट्रेलिया के नाम रहा था। भारत के लिए एकमात्र प्रसन्न होने वाली बात यही थी कि कुंबले के 400 विकेट पूरे हो गए थे।

दूसरे दिन सवेरे आते ही गिलक्रिस्ट ने आक्रमण कर दिया। दिन के 5वें ओवर में उन्होंने इरफान को दो चौके लगाए और 7वें ओवर में अनिल कुंबले की गेंद को आगे निकलकर मिड ऑन के ऊपर से दर्शक दीर्घा में भेज दिया। यह ऐडम गिलक्रिस्ट का 18वाँ अर्धशतक था।

Baggy Green:
दूसरी ओर माइकल क्लार्क 98 पर आ चुके थे। इरफान पठान गेंदबाजी कर रहे थे और उन दिनों उनकी गति ठीक ठाक थी, पर माइकल क्लार्क ने ड्रेसिंग रूम से “बैगी ग्रीन कैप” मंगाई। वे अपना शतक बैगी ग्रीन पहने हुए पूरा करना चाहते थे। यदि स्टीव वॉ से उन्होंने परामर्श लिया होता तो वे बिल्कुल सहमत होते। इरफान की गेंद को उन्होंने मिडविकेट पर खेला और दो रन के लिए भागे। उन्होंने अपनी बैगी ग्रीन को चूमा, बल्ले को चूमा, अवसर मिलता तो इस समय वे ऐडम गिलक्रिस्ट को भी चूम लेते। दर्शक दीर्घा में उनकी माता की आँखों में हर्ष के अश्रु और मुख पर मुस्कान। 1995 में ग्रेग ब्लूवेट के बाद अपने पदार्पण मैच में शतक बनाने वाले पहले ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज थे माइकल क्लार्क।

Century for the Skipper:
भोजनावकाश से कुछ मिनट पूर्व गिलक्रिस्ट ने कुंबले को चौका लगाकर अपना 11वाँ टेस्ट शतक पूर्ण किया। 3 ओवर बाद जब उन्होंने हरभजन सिंह को रिटर्न कैच थमाया तब ऑस्ट्रेलिया का स्कोर हो चुका था 423 रन 6 विकेट पर। गिलक्रिस्ट ने मात्र 109 गेंदों में 104 रन बनाए थे।

दूसरे सत्र में ऑस्ट्रेलिया ने एक घण्टे बल्लेबाजी की और 51 रन जोड़े, जिसमें से 40 रन माइकल क्लार्क के थे। क्लार्क ने अनिल कुंबले के एक ओवर में दो चौके और एक छक्का लगाया, कुंबले के अगले ओवर की पहली ही गेंद पर उन्होंने फिर छक्का लगाया। अपना मैच खेल रहा एक बल्लेबाज अनिल कुंबले को उनके घर में डॉमिनेट कर रहा था। ऐसा कदाचित ही कभी देखा गया था। क्लार्क ने अपनी पारी 151 पर समाप्त की और ऑस्ट्रेलिया की पारी 474 पर समाप्त हुई।

ऑस्ट्रेलियन समाचारपत्र क्लार्क की चर्चा से भरे पड़े थे। कोई उनके पदार्पण की तुलना डग वॉल्टर्स से कर रहा था। कोई उनके खेल की तुलना मार्क वॉ से तो कोई ग्रेग चैपल से कर रहा था। एक बात स्पष्ट थी कि ऑस्ट्रेलिया को भविष्य का सुपरस्टार मिल गया था।

Glenn McGrath:
भारतीय टीम ने इसी वर्ष जनवरी में जब ऑस्ट्रेलिया में शृंखला 1-1 से बराबर की थी तब ग्लेन मक्ग्रा ऑस्ट्रेलियाई टीम का हिस्सा नहीं थे। बैंगलोर में उन्होंने पहले ही ओवर में आकाश चोपड़ा को शून्य पर आउट किया और अगले ओवर में टेस्ट रैंकिंग में नम्बर 1 पर विराजमान और “आईसीसीसी क्रिकेटर ऑफ द यर” राहुल द्रविड़ को शून्य पर बोल्ड करके इस मैच में भारतीय टीम की संभावनाओं पर कुठाराघात कर दिया।

Will the skipper stand up?
राहुल द्रविड़ पवेलियन लौट चुके थे, सचिन तेंदुलकर टेनिस एल्बो इंजरी के कारण टीम से बाहर थे। ऐसे में टीम को मुश्किल से निकालने का दायित्व कप्तान सौरव गांगुली पर था। ऑस्ट्रेलियाई कार्यवाहक कप्तान ऐडम गिलक्रिस्ट ने शतक बनाकर एक उदाहरण प्रस्तुत किया था। क्या सौरव भी ऐसा कर सकते थे?

सौरव ने आरम्भ तो अच्छा किया और सेहवाग के साथ मिलकर स्कोर को 50 के पार पहुँचाया। ऑस्ट्रेलिया के विशाल स्कोर के समीप पहुँचने हेतु एक लंबी साझेदारी की आवश्यकता थी परंतु माइकल कैस्प्रोविच ने एक ही स्पेल में सेहवाग को 39 और गांगुली को 45 पर आउट करके मैच पर ऑस्ट्रेलियाई पकड़ और दृढ़ कर दी।

अनुभवहीन युवा बल्लेबाजों और ग्लेन मक्ग्रा के बीच कोई मुकाबला होता नहीं था और युवराज सिंह कोई अपवाद नहीं थे। मक्ग्रा ने उन्हें मात्र 5 रन पर आउट किया।

अब बारी “किंग ऑफ स्पिन” की थी। शेन वॉर्न की गेंद लेग स्टम्प की लाइन में गिरी और रक्षात्मक ढंग से खेलने का प्रयास करके लक्ष्मण के बल्ले को ताकती हुई ऑफ स्टम्प पर लगी। कुछ क्षणों के लिए माइक गैटिंग वाली गेंद की यादें ताजा हो गयी थीं। भारत का स्कोर 136 पर 6, ऑस्ट्रेलिया से 338 रन पीछे। पार्थिव पटेल, इरफान पठान और अनिल कुंबले के छोटे छोटे योगदानों ने टीम को 246 रन तक पहुँचाया। पार्थिव ने टीम के लिए सर्वाधिक 46 रन बनाए।

228 रनों की बढ़त के बाद ऑस्ट्रेलिया ने फॉलो-ऑन नहीं दिया क्योंकि ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज 89 ओवर गेंदबाजी कर चुके थे और उन्हें विश्राम की आवश्यकता थी और कहीं न कहीं कोलकाता 2001 की यादें अभी धूमिल नहीं हुई थीं।

Australia in commanding position:
तीसरे दिन की संध्या तक ऑस्ट्रेलिया का स्कोर था 127 रन पर 4 विकेट, बढ़त 355 रनों की। मार्टिन और क्लार्क दोनों खेल रहे थे। ऑस्ट्रेलिया को दूसरी पारी में अपने किसी बल्लेबाज से विशाल स्कोर की आवश्यकता नहीं थी। छोटे छोटे योगदानों से भी टीम का काम हो जाना था। ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों ने यही किया। हेडन ने 30, कैटिच ने 39, मार्टिन ने 45, गिलक्रिस्ट ने 26 और वॉर्न ने 31 रन बनाकर भारत के सामने चौथी पारी में 457 रनों का लक्ष्य रखा।

अभी 5 सत्र का खेल शेष था। ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों को पर्याप्त विश्राम मिल चुका था और उन्होंने ऑस्ट्रेलिया को 1-0 की बढ़त की ओर पहुँचाने में तनिक भी विलंब नहीं किया। 12वें ओवर में ही मात्र 19 के स्कोर पर भारत के 4 विकेट गिर गए थे। चौथे दिन का खेल समाप्त होने तक भारतीय टीम ने 6 विकेट पर 105 रन बनाए थे। उपकप्तान राहुल द्रविड़ 47 पर खेल रहे थे पर यह स्पष्ट था कि उनकी यह पारी ऑस्ट्रेलिया की विजय में थोड़ा विलम्ब अवश्य पैदा कर सकती थी पर उसे रोक नहीं सकती थी। 5वें और अंतिम दिन यही हुआ। अगले दिन राहुल द्रविड़ के बाद जब अनिल कुंबले आउट हुए तब स्कोर था 125 पर 8. इरफान पठान और हरभजन के बीच 89 रनों की साझेदारी बस भारत की पराजय का अंतर कम किया।

गिलेस्पी की शॉर्ट गेंद पर ग्लेन मक्ग्रा ने डीप फ़ाईन लेग पर हरभजन का कैच पकड़ा और ऑस्ट्रेलिया ने यह मैच 217 रनों से जीत लिया। माइकल क्लार्क मैन ऑफ द मैच चुने गए थे। ऑस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाजों ने 20 में से 15 विकेट लिए थे। शेन वॉर्न ने सहायक की भूमिका अच्छी निभाई थी। भारतीय टीम प्रबंधन को दूसरे टेस्ट से पहले कई बिंदुओं पर सोच विचार करना था।

साभार-

  1. 1993 से 2008 तक की ऑस्ट्रेलियाई टीम पर लिखी गयी Malcolm Knox की पुस्तक “The Greatest”
  2. ESPN CricInfo पर सिद्धार्थ वैद्यनाथन का लेख “Once upon a twinkle-toed debut”
  3. The Age में छपा लेख “Nervous Clarke awaits test debut.”

चित्र: Getty Images

लारा लेजेंड: 1999 फ्रैंक वॉरेल ट्रॉफी

1995 में मार्क टेलर की ऑस्ट्रेलिया ने वेस्ट इंडीज़ दौरे पर 4 टेस्ट की श्रृंखला में वेस्ट इंडीज़ को 2-1 से पराजित करके सर फ्रैंक वॉरेल ट्रॉफी अपने नाम कर ली। यह 15 वर्षों में किसी भी टेस्ट श्रृंखला में वेस्ट इंडीज़ की पहली पराजय थी। कप्तान रिची रिचर्डसन के नेतृत्व पर प्रश्नचिह्न था। विश्वकीर्तिमानधारी युवा बल्लेबाज ब्रायन लारा को नेतृत्व सौंपे जाने के स्वरों ने बल पकड़ना आरम्भ कर दिया था।

दो महीने बाद वेस्ट इंडीज़ की टीम 6 टेस्ट की श्रृंखला हेतु इंग्लैंड भ्रमण पर गयी। ओल्ड ट्रैफर्ड, मैनचेस्टर में चौथे टेस्ट में पहली पारी में ब्रायन लारा के 73 और दूसरी पारी में 145 के बाद भी इंग्लैंड ने 6 विकेट से टेस्ट जीतकर श्रृंखला 2-2 से बराबर कर ली। दो टेस्ट शेष थे पर वेस्ट इंडीज टीम में एकता का अभाव स्पष्ट दिख रहा था। ब्रायन लारा सहित कई खिलाड़ियों का मानना था कि इस परिणाम का कारण अनुशासनहीनता है। लारा ने यह संकेत भी दिया कि इस अनुशासनहीनता में कप्तान रिची रिचर्डसन भी सम्मिलित हैं। रिचर्डसन ने प्रत्युत्तर में संकेत दिया कि लारा की दृष्टि कप्तानी पर है इसलिये वे ऐसा कह रहे हैं। टीम के सदस्य जिमी ऐडम्स का कहना था कि समस्या रिची की ओर से नहीं बल्कि टीम प्रबंधन की ओर से थी। खिलाड़ियों और टीम प्रबंधन के बीच समस्याएँ तब से थीं जब वर्ष (1995) के आरंभ में से कोच रोहन कन्हाई और प्रबंधक डेविड होल्फर्ड को हटाया गया।

चौथे टेस्ट से पूर्व लारा इतने तनाव में थे कि उन्होंने अपने पूरे परिवार को ट्रिनिडाड से इंग्लैंड बुला दिया था ताकि उनके साथ समय व्यतीत करके वे अपना मानसिक तनाव कम कर सकें। परिवार के एक सदस्य ने कहा कि कदाचित यह लारा की अंतिम श्रृंखला हो सकती है। वेस्ट इंडीज़ क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष पीटर शॉर्ट ने लारा के साथ आपातकालीन बैठक की और यह निर्धारित हुआ कि प्रबंधक एवं टूर कमिटी टीम में चल रही समस्याओं का समाधान करेंगे। [ऐसा हुआ नहीं और इसके परिणाम 4 महीने बाद दिखाई पड़े।] लारा ने श्रृंखला के अंतिम 3 टेस्ट मैचों में 3 शतक लगाए और श्रृंखला की 10 पारियों में 85 की औसत से 765 रन बनाए।

श्रृंखला 2-2 से बराबर रही। वेस्ट इंडीज़ में कोई भी इससे संतुष्ट नहीं था क्योंकि लम्बे समय से वेस्ट इंडियन लोगों ने अपनी टीम द्वारा इंग्लैंड को प्रत्येक श्रृंखला में पराजित होते देखा था। रिची रिचर्डसन से कप्तानी लेकर ब्रायन लारा को दिए जाने के स्वर अब और मुखर हो गए।स्वयं लारा के मेंटोर Joey Carew ने यह बात उठाई और अगले दौरे के कप्तान के रूप में लारा का नाम प्रस्तावित कर दिया।

अगला दौरा नवम्बर 1995 में ऑस्ट्रेलिया का था। इंग्लैंड दौरे पर उभरे अनुशासनात्मक विषयों की पड़ताल के लिए बनाई गई कमिटी ने 4 खिलाड़ियों कर्टली ऐम्ब्रोस, केनी बेंजामिन, कार्ल हूपर और ब्रायन लारा को अनुशासन तोड़ने का दोषी पाया और इंग्लैंड दौरे के पारितोषिक का 10% अर्थदण्ड लगाया। लारा इस बात से आहत थे कि उनका नाम वास्तविक दोषियों के साथ जोड़कर उन्हें दंडित क्यों किया जा रहा है। उनका मानना था कि 4 माह पूर्व जब बोर्ड अध्यक्ष के साथ बैठक में उन्होंने विवाद सुलझा ही लिया था तो अब कमिटी के इस निर्णय का क्या अर्थ है!

वेस्ट इंडीज़ टीम जब ऑस्ट्रेलिया के लिए प्रस्थान करने को थी उससे 2 दिन पूर्व लारा ने दौरे से अपना नाम वापस ले लिया। इससे बहुत बड़ा विवाद उत्पन्न हुआ और लारा की कटु आलोचना हुई। बाहरी लोगों को लगा कि लारा का यह कृत्य एक उद्दंड बालक द्वारा अनुशासित किए जाने के विरोध में दी जाने वाली प्रतिक्रिया है।

लारा वेस्ट इंडीज़ क्रिकेट बोर्ड को प्रिय नहीं थे, यह बात तो स्पष्ट थी परंतु उन्हें यह भी पता था ब्रायन लारा वेस्ट इंडीज़ क्रिकेट के भविष्य हैं और एकमात्र खिलाड़ी हैं जो वेस्ट इंडीज़ क्रिकेट को पुनः शिखर पर ले जाने में सक्षम हैं। मध्यमार्ग अपनाया गया। बारबेडस के हिल्टन होटल में बैठक हुई। लारा को दौरे से नाम वापस लेने के लिए चेतावनी मिली और लारा ने स्वयं को 1996 विश्वकप टीम में चयन के लिए उपलब्ध घोषित किया।

29 फरवरी 1996: विश्वकप में वेस्ट इंडीज़ केन्या के 166 के उत्तर में 93 पर सिमट गई। एक सप्ताह के भीतर रिची रिचर्डसन ने घोषित कर दिया कि यह कप्तान के रूप में उनका अंतिम टूर्नामेंट है। मोहाली में हुए सेमीफाइनल में वेस्ट इंडीज़ सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया से हारकर विश्वकप से बाहर हो गयी।

रिचर्डसन का उत्तराधिकारी कौन होगा इसपर चर्चाएँ आरम्भ हो गई थीं। ब्रायन लारा सबसे बड़े प्रतियोगी थे परंतु वेस्ट इंडीज़ क्रिकेट बोर्ड उन्हें और शक्ति देना नहीं चाहता था, क्योंकि बोर्ड के लोग जानते थे कि वे लारा को नियंत्रित नहीं कर सकते। 34 वर्षीय कोर्टनी वॉल्श को कप्तान बनाया गया। लारा को उपकप्तानी भी नहीं मिली। तेज गेंदबाज इयन बिशप को उपकप्तान बनाया गया।

वॉल्श की कप्तानी में पहली श्रृंखला न्यूज़ीलैंड के विरुद्ध थी, वेस्ट इंडीज़ ने 1-0 से विजय प्राप्त की। लारा का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा, उनका उच्चतम स्कोर 74 रहा। उन्होंने कहा कि छोटी टीमों का गेंदबाजी आक्रमण उन्हें अच्छा स्कोर करने के लिए प्रेरित नहीं कर पाता। उनका ध्यान अब ऑस्ट्रेलिया में और उसके बाद प्रथम दक्षिण अफ्रीका दौरे पर अच्छा प्रदर्शन करने का रहेगा।

लारा ऑस्ट्रेलिया में कुछ विशेष नहीं कर सके। उन्होंने पर्थ टेस्ट में अपना एकमात्र शतक लगाया। वेस्ट इंडीज़ ने यह टेस्ट जीता पर श्रृंखला 3-2 से गँवा दी।

भारत के विरुद्ध 5 टेस्ट मैचों की श्रृंखला विश्व क्रिकेट के दो सबसे बड़े बल्लेबाजों सचिन तेंदुलकर और ब्रायन लारा के बीच द्वंद्व के रूप में प्रचारित की गयी थी। वेस्ट इंडीज़ ने यह श्रृंखला 1-0 से जीती। (लारा ने 49 की औसत से एक शतक सहित 391 रन बनाए)। बारबेडस में हुए तीसरे टेस्ट में वॉल्श की हैमस्ट्रिंग चोट के कारण लारा ने कप्तानी की और कप्तान के रूप में अपना पहला टेस्ट जीतने वाले वेस्ट इंडीज़ के छठे कप्तान बन गए।

पाकिस्तान दौरे के लिए टीम की घोषणा से पूर्व लारा और वॉल्श के बीच विवाद के अपुष्ट समाचार आने आरम्भ हो गए। चयनकर्ताओं ने ब्रायन को कप्तान बनाने की अनुशंसा की परंतु बोर्ड ने इसे अस्वीकार कर दिया। इस दौरे पर वेस्ट इंडीज़ सभी अभ्यास मैचों समेत तीनों टेस्ट मैचों में पराजित हुई (दो में तो पारी से)। 69 वर्षों में यह प्रथम अवसर था, जब वेस्ट इंडीज़ श्रृंखला के सभी टेस्ट मैचों में पराजित हुई थी। लारा की औसत मात्र 21.5 और उच्चतम स्कोर 37 था। वॉल्श के देश जमाएका में यह बातें आरंभ हो गईं थीं कि लारा जानबूझकर वॉल्श की कप्तानी में अच्छा नहीं खेल रहे हैं। कोच मैल्कम मार्शल ने इन समाचारों का खंडन किया।

Finally he’s the captain:
1998 में ब्रायन लारा को कप्तान बनाए जाने की माँग अपने चरम पर थी और बोर्ड के पास उन्हें कप्तान न बनाने के बहाने समाप्त हो चले थे। जनवरी 1998 में ब्रायन को कप्तान बनाए जाने की घोषणा से ठीक पूर्व ट्रिनिडाड के क्वीन्सपार्क क्रिकेट क्लब में अपने भाषण में महान वेस्ट इंडियन कॉमेंटेटर टोनी कोजियर ने कहा, “We now have to say Brian Lara, this is your time, you come forward and lead the West Indies Team.” इंग्लैंड 6 टेस्ट मैचों की श्रृंखला के लिए वेस्ट इंडीज़ आने वाली थी। इससे मात्र 3 सप्ताह पूर्व जिस प्रकार वॉल्श को हटाकर लारा को कप्तान बनाया गया, इससे वॉल्श प्रसन्न नहीं थे। टीम जिन परिस्थितियों में थी, उसमें पाकिस्तान दौरे के अतिरिक्त एक कप्तान के रूप में उनका रिकॉर्ड सम्मानजनक था। यहाँ तक कि वॉल्श के मन में क्रिकेट से सन्यास लेने तक का विचार आ गया था।

वॉल्श के देश जमाएका में लारा अलोकप्रिय हो चुके थे। श्रृंखला का प्रथम टेस्ट जमाएका के सबाइना पार्क में था। टेस्ट के पहले दिन स्टेडियम में लारा का विरोध होने की आशंका जताई गयी थी। वॉल्श ने यहाँ अपने अनुभव और परिपक्वता का प्रदर्शन करते हुए लारा के कंधे पर हाथ रखकर स्टेडियम में प्रवेश किया और दर्शक दीर्घा से लारा का विरोध होने की संभावना को विराम दे दिया। घातक उछाल के कारण मात्र एक घण्टे के खेल के उपरांत मैच को रद्द कर दिया गया। वेस्ट इंडीज़ ने यह टेस्ट श्रृंखला 3-1 से और इसके बाद एकदिवसीय श्रृंखला 4-1 से जीती। इस प्रकार वेस्ट इंडीज़ के कप्तान के रूप में ब्रायन लारा की यात्रा का शुभारंभ हुआ।

Heathrow Standoff:
नवम्बर 1998 में वेस्ट इंडीज़ टीम को दक्षिण अफ्रीका दौरे के लिए निकलना था। पहली फ्लाइट वेस्ट इंडीज़ से लंडन और फिर वहाँ से दूसरी फ्लाइट लंडन से योहानेसबर्ग के लिए जाने वाली थी। इस दल के 9 खिलाड़ियों ने लंडन में रुककर WIPA (वेस्ट इंडीज़ प्लेयर्स असोसिएशन) की बैठक में भाग लेने का मन बनाया था। इनमें से 7 तो वेस्ट इंडीज़ से आए थे और दो (लारा और कार्ल हूपर) ढाका से। WIPA की इस बैठक में भुगतान और कॉन्ट्रैक्ट संबंधी विषयों पर चर्चा होनी थी। खिलाड़ियों और बोर्ड के बीच भुगतान को लेकर विवाद लम्बे समय से चल रहा था और बोर्ड इसे सुलझाने में रुचि नहीं दिखा रहा था। इस बैठक के बाद इन 9 खिलाड़ियों ने लंडन के हीथ्रो एयरपोर्ट के Excesior होटल में हड़ताल कर दी और स्पष्ट कर दिया कि जबतक बोर्ड कॉन्ट्रैक्ट संबंधी विवाद नहीं सुलझाता तबतक वे दक्षिण अफ्रीका के लिए नहीं निकलेंगे। यह हड़ताल एक सप्ताह तक चल गई। वेस्ट इंडीज़ क्रिकेट बोर्ड (WICB) ने लारा और हूपर को एन्टीगा में बैठक के लिए बुलाया। प्रत्युत्तर में इन दोनों में बोर्ड के प्रतिनिधियों को बैठक के लिए लंडन आने का निमंत्रण दिया। दोनों पक्षों ने एक दूसरे का प्रस्ताव अस्वीकृत कर दिया तब बोर्ड ने कप्तान लारा और उपकप्तान कार्ल हूपर को दौरे की टीम से बाहर कर दिया।

वेस्ट इंडीज़ का दक्षिण अफ्रीका दौरा एक क्रिकेट श्रृंखला के साथ साथ एक राजनीतिक और सामाजिक संदेश के लिए भी था। मीडिया कैमरों के सामने बहुत बड़ा तमाशा सा बन गया था। दक्षिण अफ्रीकी क्रिकेट बोर्ड के प्रबंधन निदेशक डॉ अली बाकर लंडन आए और उन्होंने 9 विद्रोही वेस्ट इंडियन खिलाड़ियों को दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला का हस्ताक्षरयुक्त पत्र दिया, जिसमें मंडेला ने इन खिलाड़ियों से समस्या का समाधान ढूंढ़ने को प्रेरित किया था। WICB के अध्यक्ष पैट रुसौ भी हीथ्रो एयरपोर्ट पहुँचे और 19 घंटों तक चली वार्ता के बाद खिलाड़ियों के कॉन्ट्रैक्ट में शुल्क संरचना और इंश्योरेंस संबंधी सुधार किए गए और भविष्य में बोर्ड की ओर से व्यवहार में सुधार का आश्वासन दिया गया। इन 9 खिलाड़ियों में से एक जिमी ऐडम्स कहते हैं कि ब्रायन लारा आलोचना का केंद्रबिंदु बने हुए थे पर वे यह काम टीम के लिए कर रहे थे।

Disastrous SA Tour:
दक्षिण अफ्रीका दौरा वेस्ट इंडीज़ टीम और ब्रायन लारा के लिए एक भयावह स्वप्न के समान था। टेस्ट श्रृंखला में 5-0 से वाईटवॉश (चार मैच तो बहुत भारी अंतर से) और एकदिवसीय श्रृंखला में 6-1 से पराजय। लारा ने 5 टेस्ट की 10 पारियों में 31 की औसत से 310 रन बनाए। उन्होंने टीम में एकता और आत्मविश्वास के अभाव को पराजय का प्रमुख कारण बताया और अपनी कप्तानी के बारे में पूछे जाने पर कहा कि वे अभी कप्तानी सीख रहे हैं।

वेस्ट इंडियन मीडिया ने कोई नरमी नहीं दिखाई। लारा पर आरोप लगे कि वे बिल्कुल उदासीन और टीम को एक करने में अक्षम रहे हैं, अपने साथी खिलाड़ियों को प्रेरित नहीं कर सके हैं। लारा को कप्तान बनाने के समर्थक रहे कॉमेंटेटर टोनी कोजियर [जो “वॉइस ऑफ वेस्ट इंडियन क्रिकेट” के रूप में प्रसिद्ध थे] ने कहा, “For too long he [Lara] has listened to sycophants and popularity seekers whose pandering has not prepared him for the responsibility of leadership.”

Arrival of the Mighty Aussies:
वेस्ट इंडीज़ टीम और ब्रायन लारा की लय में वापसी की संभावनाएँ क्षीण थीं क्योंकि नवनियुक्त कप्तान स्टीव वॉ की शक्तिशाली ऑस्ट्रेलिया 4 टेस्ट और 5 एकदिवसीय मैचों की श्रृंखला हेतु कुछ ही दिनों बाद वेस्ट इंडीज़ पहुँच रही थी। [ऑस्ट्रेलिया ने 4 वर्ष पूर्व कैरेबियन में 2-1 से टेस्ट श्रृंखला जीती थी, उसके नायक स्टीव वॉ ही थे, जिन्होंने सर्वाधिक 429 रन बनाए थे।]

वेस्ट इंडीज़ पहुँचते ही ब्रायन ने स्वयं को एक कमरे में बंद कर लिया। वे अपनी बल्लेबाजी की वीडियो फुटेज का विश्लेषण कर रहे थे। अपनी त्रुटियों को जानने का प्रयास कर रहे थे और उन्हें सुधारने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो रहे थे।

वेस्ट इंडीज़ क्रिकेट बोर्ड के पास अब ब्रायन लारा को कप्तानी से हटाने के पर्याप्त कारण थे परंतु किसी अन्य विकल्प की अनुपलब्धता ने लारा को एक और अवसर दिया। ब्रायन के पक्ष में खड़े होने वाले स्वर अब पहले जितने मुखर नहीं थे। बोर्ड की बैठक के उपरांत अध्यक्ष पैट रुसौ ने कहा कि उन्होंने ब्रायन को अपने नेतृत्व में महत्वपूर्ण सुधार करने को कहा है, उन्हें “Specific Performance Target” दिए गए हैं, जिनके आधार पर यह तय होगा कि उन्होंने अपने नेतृत्व, अनुशासन और खिलाड़ियों के साथ अपने संबंधों में सुधार किया है या नहीं। कोच और प्रबंधक के साथ उनकी बातचीत और नए खिलाड़ियों के विकास पर विशेष ध्यान रहेगा। दूसरे टेस्ट के उपरांत बोर्ड यह निर्णय लेगा कि ब्रायन इन मानकों पर खरे उतरे हैं या नहीं और क्या शेष दो टेस्ट के लिए उन्हें कप्तानी दी जाए या नहीं।

किसी को ऐसे अपमानित करना और फिर कहना “गुड लक तुम्हारे पास 2 टेस्ट हैं”, अजीब बात थी पर जो था यही था। श्रृंखला का प्रथम टेस्ट लारा के देश ट्रिनिडाड ऐंड टोबैगो में था। क्वीन्स पार्क ओवल, पोर्ट ऑफ स्पेन में पहली पारी में ऑस्ट्रेलिया के 269 के उत्तर में वेस्ट इंडीज़ एक समय 149 पर 3 थी पर यहाँ ब्रायन लारा 62 रन बनाकर रन आउट हो गए और पूरी टीम 167 पर सिमट गयी। यदि यह बुरा था तो दूसरी पारी में बहुत बुरा होने वाला था, जहाँ वेस्ट इंडीज़ अपने क्रिकेट इतिहास के सबसे कम स्कोर 51 पर मात्र 19.1 ओवरों में ऑल आउट हो गई। ग्लेन मक्ग्रा ने मैच में 10 विकेट लिए और स्टीव वॉ ने अपनी कप्तानी का पहला टेस्ट जीत लिया।

दूसरे टेस्ट के लिए श्रृंखला लारा के देश से वॉल्श के देश जमाएका पहुँची। जहाँ लारा पहले से ही अलोकप्रिय थे। टॉस के लिए सिक्का उछलते समय ब्रायन लारा ने स्टीव वॉ से कहा, “This could be the last time I’ll be doing this.” इस समय यह कल्पना करना भी कठिन था कि कोई भी अन्य खिलाड़ी ब्रायन लारा से अधिक दबाव में हो सकता है। यह दबाव तब और बढ़ गया जब सबाइना पार्क में पहले दिन कप्तान स्टीव वॉ के शतक की सहायता से ऑस्ट्रेलिया ने 256 रन बनाए और संध्या तक 37 रन पर 4 विकेट वेस्ट इंडीज़ के 4 विकेट गिरा दिए। ब्रायन लारा 5वें ओवर में ही बल्लेबाजी के लिए आ गए थे जब स्कोर 5 रन पर 2 विकेट था।

The Dark Knight Rises:
खेल समाप्त होने तक ब्रायन लारा सात रन पर खेल रहे थे। उनका क्रिकेट करियर संकट में था। बल्ले से रन नहीं निकल रहे थे, टीम एक के बाद एक टेस्ट में बड़े बड़े अंतरों से पराजित हो रही थी। पिछले 15 टेस्ट मैचों में उन्होंने शतक नहीं बनाया था। परंतु काँटों में राह बनाना महान खिलाड़ियों की पहचान रही है। भविष्य अंधकारमय दिख रहा था परंतु जहाँ लारा जैसा सूर्य विद्यमान हो क्या वहाँ कभी अंधकार हो सकता है?

दूसरे दिन रात्रि प्रहरी पेड्रो कॉलिन्स ने कुछ देर तक लारा का साथ दिया पर वे मक्ग्रा की गेंद पर चोटिल होकर लौट गए। ब्रायन लारा का साथ देने आए वामहस्त जिमी ऐडम्स, जो जूनियर क्रिकेट के समय से ही उनके साथी थे। ऐडम्स कहते हैं कि योजना बनी कि अधिक से अधिक समय तक खेला जाए। हर ओवर के उपरांत दोनों बल्लेबाज गणना कर रहे थे कि अभी दिन के इतने ओवर शेष हैं, भोजनावकाश तक इतने।

ब्रायन लारा ने अपना अर्धशतक 140 गेंदों में पूरा किया। लारा ऐसी स्ट्राइक रेट से खेलने के लिए नहीं जाने जाते थे पर अभी वे नींव बना रहे थे। ओवर गिनने के अतिरिक्त दोनों बल्लेबाज दूसरी योजना पर भी काम कर रहे थे। वह योजना थी कि ऐडम्स ग्लेन मक्ग्रा की गेंदों को रोकें और लारा दूसरे गेंदबाजों का सामना करें क्योंकि एक तो लारा का विकेट अधिक महत्वपूर्ण था, दूसरा यह कि लारा तीव्र गति से रन बनाने में सक्षम थे, विशेषकर स्पिन गेंदबाजों के विरुद्ध।

अर्धशतक पार करने के उपरांत ब्रायन लारा ने आक्रमण आरम्भ किया और शेन वॉर्न की गेंद को 6 रनों के लिए Cow Corner सीमारेखा के बाहर भेजा। 60वें ओवर में स्टुअर्ट मैक्गिल की फ्लाइटेड गेंद को लारा ने पुनः कवर बाउंड्री के बाहर भेज दिया। “Typical Brian Lara Cover Drive” ऊँची बैकलिफ्ट, अगला पैर थोड़ा सा आगे, शक्तिशाली प्रहार और सुंदर फॉलो थ्रू। पुराने ब्रायन लारा वापस आ चुके थे और आज उन्हें रोक पाने की क्षमता किसी गेंदबाज में नहीं थी। मैक्गिल के इस ओवर में 3 चौके आए और लारा 90 के पार जा पहुँचे। गिलेस्पी की गेंद पर एक रन लेकर ब्रायन लारा ने अपना 11वाँ टेस्ट शतक पूर्ण किया।

टोनी कोजियर लिखते हैं, “Lara was seemingly touched by some magic wand that transformed the timidity one had seen in South Africa into the assertive self-belief that had been his hallmark.”

इस पारी में ही ब्रायन लारा ने अपने टेस्ट करियर के पाँच हज़ार रन पूरे कर लिए थे। चायकाल तक वेस्ट इंडीज़ का स्कोर था 227/4 और लारा 113 पर खेल रहे थे। चायकाल के बाद लारा ने और आक्रामक रूप धारण किया। ऑस्ट्रेलिया के पहली पारी के स्कोर (256) को पार करके उन्होंने स्टुअर्ट मैक्गिल को आगे निकलकर दो लगातार छक्के लगाए। पहला लॉन्ग ऑन और दूसरा मिडविकेट के ऊपर से। मैक्गिल की ही गेंद पर एक रन के साथ उन्होंने अपने 150 रन पूरे किए।

लारा के बल्ले से निकली गेंदें मैदान की हर दिशा में चौके छक्के के लिए जा रही थीं। कप्तान स्टीव वॉ ने ग्लेन मक्ग्रा को आक्रमण पर लगाया। लारा पूरी तरह तैयार थे। मक्ग्रा की एक गेंद को उन्होंने स्लिप और गली के बीच का मार्ग दिखा दिया और उसी ओवर में एक आगे फेंकी हुई गेंद पर मैच का सबसे दर्शनीय शॉट खेला, कवर ड्राइव, ऑन द राइज़। कॉमेंट्री कर रहे डेविड हुक्स के शब्द, “That’s probably the most stunning piece of batting we have seen today. Glenn McGrath can only shake his head and wonder.”

Stunning Double Hundred:
ग्रेग ब्लूवेट को लगातार चार चौके लगाकर ब्रायन लारा 183 से 199 पर जा पहुँचे। चारों चौके मैदान के अलग अलग भागों में, पहला चौका मिडविकेट की ओर, दूसरा थर्डमैन की ओर, तीसरा मिड ऑफ के ऊपर से और चौथा बिल्कुल सीधा, अंपायर के पास से। 199 पर आकर शेन वॉर्न की गेंद को लारा ने कलाइयों का प्रयोग करते हुए मिड ऑन और मिडविकेट के बीच से निकाला और रन के लिए दौड़ पड़े। गेंद बाउंड्री के बाहर पहुँचने ही वाली थी कि दर्शक पुनः मैदान में घुस गए, एक ने तो गेंद को बाउंड्री पार करने से पूर्व ही उठा लिया और सभी लारा को बधाई देने के लिए दौड़ पड़े। लारा सरपट ड्रेसिंग रूम की ओर भागने लगे लेकिन दर्शकों ने उन्हें सीमारेखा के पास घेर लिया और पर्याप्त बधाई देने के बाद ही छोड़ा।

दिन के खेल की समाप्ति के समय वेस्ट इंडीज़ का स्कोर 105 ओवर में 377/4, आज 340 रन बने थे बिना किसी विकेट के। लारा 212 और जिमी ऐडम्स 88 पर खेल रहे थे। लारा इस पारी में अबतक 29 चौके और 3 छक्के लगा चुके थे। अपनी टीम को संकट से निकालने के साथ साथ उन्होंने दर्शकों का पर्याप्त मनोरंजन किया था।

ट्रिनिडाडियन लेखिका Vaneisa Baksh लिखती हैं कि इस मैच में उनके लिए भावुक करने वाले कई क्षण थे पर सबसे अधिक भावुक क्षण था जब मक्ग्रा की शॉर्ट गेंद लारा के सिर पर लगी और वे गिर पड़े। Vaneisa लिखती हैं, “It was numbing to all, but he rose. He rose from the blow and drove McGrath to cover for a four that resonated with the ring of steel.”

जो मैच एक दिन पहले पूरी तरह ऑस्ट्रेलिया की पकड़ में था, ब्रायन लारा की इस पारी ने उसे वेस्टइंडीज़ के पाले में डाल दिया था। अगले दिन लारा अपने स्कोर में मात्र 1 रन जोड़कर आउट हो गए और इसके साथ लारा और ऐडम्स के बीच 5वें विकेट की साझेदारी 322 रन जोड़कर समाप्त हुई। वेस्ट इंडीज़ 175 रनों की बढ़त के साथ 431 पर ऑल आउट हो गई। जिमी ऐडम्स ने 94 रनों का योगदान दिया। [लारा और ऐडम्स के बाद वेस्ट इंडीज़ की पारी में तीसरा बड़ा योगदान अतिरिक्त रनों (42) का था।] दूसरी पारी में ऑस्ट्रेलिया की टीम मात्र 177 रन बना सकी और वेस्ट इंडीज़ को 3 रनों का लक्ष्य मिला जिसे मात्र 3 गेंदों में पूरा करके 10 विकेट से यह मैच जीत लिया। मैन ऑफ द मैच कौन होगा, यह कोई प्रश्न था ही नहीं।

13 वर्ष बाद जब ब्रायन लारा को ICC हॉल ऑफ फेम में सम्मिलित किया गया तब उन्होंने कहा कि सबाइना पार्क की 213 रनों की पारी उनकी महानतम पारी है। इस पारी में उन्होंने जिस मानसिक दृढ़ता का प्रदर्शन किया उसको ध्यान में रखते हुए उनके लिए अपनी किसी और पारी को इससे ऊपर रख पाना असंभव है।

वेस्ट इंडीज़ की विजय और ब्रायन लारा के इस प्रदर्शन के बीच इस बात पर किसी का ध्यान ही नहीं गया था कि अभी वेस्ट इंडीज़ क्रिकेट बोर्ड ने अभी ये घोषित नहीं किया कि अगले 2 टेस्ट में लारा कप्तान होंगे या नहीं। लारा ने चुटकी लेते हुए कहा, “There were criteria set out by the board. I hope they were confidential.”

बारबेडस में तृतीय टेस्ट में स्टीव वॉ ने पुनः टॉस जीता और 199 रनों की अद्भुत पारी खेलकर ऑस्ट्रेलिया को 490 रनों तक पहुँचा दिया। रिकी पॉन्टिंग ने भी शतक बनाया। ब्रायन लारा से पिछले मैच का प्रदर्शन दोहराने की आशा कर रहे वेस्ट इंडियन समर्थकों को झटका लगा जब जेसन गिलेस्पी की एक शॉर्ट गेंद लारा के दस्ताने से लगकर उठ गई। लारा ने मात्र 8 रन बनाए। कुछ समय बाद ही स्कोर 98/6 हो चुका था। ओपनर शेरविन कैम्पबेल और विकेटकीपर रिडली जैकब्स के बीच हुई 153 रनों की साझेदारी और पुछल्ले बल्लेबाजों के योगदान ने वेस्ट इंडीज़ का स्कोर 329 तक पहुँचाया। कैम्पबेल ने 103 और जैकब्स ने 68 रन बनाए। अब भी ऑस्ट्रेलिया के पास 161 रनों की बढ़त थी।

वेस्ट इंडियन तेज गेंदबाजों ने दूसरी पारी में ऑस्ट्रेलिया के 7 विकेट मात्र 81 पर गिरा दिए। पॉन्टिंग और वॉर्न के बीच 53 रनों की साझेदारी की सहायता से ऑस्ट्रेलिया 307 की बढ़त के साथ 146 पर ऑल आउट हुई। वॉल्श ने 5 विकेट लिए। लक्ष्य बड़ा था पर फिर भी वेस्ट इंडियन समर्थकों के पास विजय की आशा रखने का एक कारण था- ब्रायन चार्ल्स लारा।

शेरविन कैम्पबेल और एड्रियन ग्रिफिथ ने 72 रनों की आरंभिक साझेदारी की पर शीघ्र ही यह स्कोर 78/3 हो गया। नम्बर 4 पर आए रात्रि प्रहरी पेड्रो कॉलिंस 0 पर आउट हो गए और ब्रायन लारा को बल्लेबाजी के लिए आना पड़ा। चौथे दिन का खेल समाप्त होने तक लारा 2 रन पर खेल रहे थे और स्कोर था 85 पर 3.

ऑस्ट्रेलियाई दल आत्मविश्वास से भरा हुआ था। जस्टिन लैंगर के अनुसार ऑस्ट्रेलिया के पास 3 योजनाएँ थीं। A- Get Lara out, B – Get Lara out और C- Get Lara out. जब उनसे पूछा गया, “What if Lara bats all day?” तो लैंगर का उत्तर था, “That’s not going to happen.”

The Greatest Knock in a Run Chase:
ट्रिनिडाड ऐंड टोबैगो के पूर्व टीम प्रबंधक Colin Borde कहते हैं कि वे अंतिम दिन के आरम्भ से पूर्व ब्रायन लारा को मैदान में देख रहे थे। लारा दोनों छोर से गार्ड ले रहे थे और “Shadow Batting” कर रहे थे। वे “Visualise” कर रहे थे जो वे मैच में करने वाले थे।

पाँचवें दिन का खेल 85/3 पर आरम्भ हुआ पर दिन के पहले ही घण्टे में जेसन गिलेस्पी के घातक स्पेल ने स्कोर को 105/5 कर दिया। ब्रायन लारा और जिमी ऐडम्स पुनः एक साथ क्रीज पर थे और लगातार दूसरे मैच में इतिहास बनाने का अवसर उनके पास था। भोजनावकाश तक लारा और ऐडम्स ने बिना किसी अतिरिक्त क्षति के स्कोर को 161/5 पर पहुँचाया।

अंतिम दो सत्र में 147 रनों की आवश्यकता। यदि वेस्ट इंडीज़ की पराजय होनी थी तो लारा यह सुनिश्चित करने वाले थे कि वह बिना संघर्ष के नहीं होगी। उन्होंने राउंड द विकेट से गेंदबाजी कर रहे शेन वॉर्न की एक शॉर्ट गेंद को पुल के माध्यम से मिडविकेट बाउंड्री के ऊपर से “ग्रीनिज ऐंड हेन्स” स्टैंड की छत पर पहुँचाकर 118 गेंदों में अपना अर्धशतक पूर्ण किया।

Lara vs McGrath:
सबाइना पार्क वाली पारी की भाँति केन्जिंगटन ओवल में भी अर्धशतक के पश्चात लारा ने गियर बदल लिया। पिछली 15 गेंदों में उनके बल्ले से 25 रन आ चुके थे और वेस्ट इंडीज़ का स्कोर फो सौ के पार चला गया था। इसी समय वे मक्ग्रा की एक शॉर्ट गेंद को पढ़ने में अक्षम रहे और गेंद उनके हेलमेट के पिछले भाग पर लगी। वे गिरकर उठे और एक लेग बाई के लिए दौड़े। दूसरे छोर पर लारा और मक्ग्रा के बीच कुछ शब्दों का आदान प्रदान हुआ। जिमी ऐडम्स लारा को अलग ले गए। अम्पायर एडी निकल्स को यह बात भले रुचिकर न लगी हो पर दर्शकों का उत्साह बढ़ गया था। स्टीव वॉ कहते हैं कि ब्रायन लारा स्वयं का उत्साहवर्धन करने के लिए इस विधा का प्रयोग करते रहते थे। यह विधा प्रभावी थी क्योंकि मक्ग्रा की अगली ही शॉर्ट गेंद को लारा ने मिडविकेट क्षेत्र में पुल करके चार रनों के लिए भेज दिया और इसी के साथ ब्रायन लारा और जिमी ऐडम्स की शतकीय साझेदारी पूर्ण हुई।

“The Prodigal Son turned Messiah.” एड्रेनलिन का प्रभाव अपने चरम पर था और ब्रायन लारा मक्ग्रा की प्रत्येक शॉर्ट गेंद को बाउंड्री के पार भेजना चाह रहे थे। दोनों के मध्य शब्दों का आदान प्रदान समाप्त नहीं हुआ था। वेस्ट इंडीज़ को अभी भी विजय हेतु पूरे सौ रन चाहिए थे और इस समय ब्रायन लारा का विकेट गिरना वेस्ट इंडीज़ की संभावनाओं के लिए भयावह हो सकता था। यही सोचकर माइकल होल्डिंग ने कॉमेंट्री बॉक्स में कहा कि कुछ समय तक मक्ग्रा का सामना जिमी ऐडम्स को करना चाहिए ताकि ब्रायन लारा एकाग्रचित्त होकर टीम के लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित कर सकें न कि मक्ग्रा के विरुद्ध निजी युद्ध जीतने पर। मक्ग्रा की अंतिम गेंद को जिमी ऐडम्स ने रोक लिया और इस प्रकार इस श्रृंखला का सबसे मनोरंजक ओवर समाप्त हुआ।

लारा अब नब्बे के पार थे। शेन वॉर्न के हाथ में गेंद, लारा आगे निकले और उन्होंने गेंद को मिड ऑन सीमारेखा के बाहर चौके के लिए भेजकर टेस्ट क्रिकेट में अपना 12वाँ और श्रृंखला का दूसरा शतक पूर्ण किया। कॉमेंटेटर टोनी कोजियर का अविस्मरणीय कथन, “The West Indies captain. The Prodigal Son turned Messiah.”

Disaster strikes:
विजय अब मात्र 70 रन दूर थी। इसी समय ग्लेन मक्ग्रा की गेंद अंदर आई और जिमी ऐडम्स के बल्ले को परास्त करती हुई ऑफ स्टम्प पर लगी। 133 रनों की साझेदारी का अंत हुआ। जिमी ऐडम्स ने 38 बहुमूल्य रन बनाए थे, पर उससे महत्त्वपूर्ण यह था कि वे 125 गेंदें खेले थे और ब्रायन लारा के साथ टिके रहे थे। ग्लेन मक्ग्रा ने एक बार पुनः ऑस्ट्रेलिया को मैच में वापस ला दिया था। चायकाल से पूर्व उन्होंने विकेटकीपर बल्लेबाज रिडली जैकब्स और ऑफ स्पिनर नेहेमिया पेरी को लगातार गेंदों पर आउट करके वेस्ट इंडीज़ का स्कोर 248/8 कर दिया। विजय अभी भी 60 रन दूर। दूसरे छोर पर ब्रायन लारा अपनी इस महान पारी को व्यर्थ जाता देख रहे थे। चायकाल की घोषणा 254/8, ब्रायन लारा अविजित 112. अंतिम सत्र में 54 रनों की आवश्यकता।

जिमी ऐडम्स कहते हैं कि जब वे आउट होकर पवेलियन पहुँचे तो उन्हें पता चला कि जितना तनाव पिच पर था उससे कहीं अधिक बालकनी में था। टीम प्रबंधक क्लाइव लॉयड ने तो टोटकों का आश्रय ले लिया था और सबको आदेश दे दिया था कि जबतक ब्रायन बल्लेबाजी कर रहे हैं तब तक कोई भी अपने स्थान से हिलेगा नहीं। पेड्रो कॉलिंस शौचालय जाने के लिए छटपटा रहे थे पर क्लाइव ने आज्ञा नहीं दी।

कर्टली ऐम्ब्रोस ने पहली पारी में भले ही 28 रन बनाए थे पर उनकी बल्लेबाजी पर कोई विश्वास नहीं कर सकता था। अतः ब्रायन लारा ने शेष रन स्वयं ही बनाने के साथ ऐम्ब्रोस को सुरक्षित रखने हेतु यथासंभव स्ट्राइक अपने पास ही रखने का निर्णय ले लिया था।

लारा ने आगे निकलकर शेन वॉर्न की गेंद को मिडविकेट और मिड ऑन के बीच से ऑन ड्राइव करके सीमारेखा के बाहर भेजा। वॉर्न ने ऑफ स्टंप के बाहर गेंद फेंकी। लारा ने घुटनों पर बैठकर एक अद्भुत कवर ड्राइव लगाई। आवश्यक रनों की संख्या अब 20 से नीचे आ गई थी।

लारा स्ट्राइक क्यों अपने पास रख रहे थे, ऐम्ब्रोस ने यह बात समझाने का प्रयास किया। मक्ग्रा की शॉर्ट गेंद ऑफ स्टम्प के बहुत बाहर, ऐम्ब्रोस ने बल्ला अड़ाया। भाग्यशाली रहे कि गेंद गली और तीसरी स्लिप के बीच से चार रनों के लिए निकल गयी।

एक एक रन आते गए, स्कोर तीन सौ के पास जा पहुँचा था और अब मात्र 6 रनों की आवश्यकता थी। गिलेस्पी की गेंद को थर्डमैन की ओर खेलने का प्रयास करते समय लारा के बल्ले का किनारा लेकर गेंद विकेट के पीछे गई। विकेटकीपर इयन हीली ने अपने बायीं ओर डाइव लगाई, गेंद उनके बाएँ हाथ में लगी पर वे कैच पकड़ने में असफल रहे। लारा भाग्यशाली रहे पर ऐम्ब्रोस का भाग्य अब और साथ देने वाला नहीं था। गिलेस्पी की ऑफ स्टम्प के बाहर गेंद पर पुनः बल्ला अड़ाने के प्रयास में गेंद तीसरी स्लिप में मैथ्यू एलियट के हाथों में चली गई। स्कोर 302/9, कर्टली ऐम्ब्रोस ने 39 गेंदों में 12 रन की पारी खेलकर मैच में दूसरी बार बल्ले से बहुमूल्य योगदान दिया था।

ब्रायन लारा सोच रहे होंगे कि क्यों उन्होंने ऐम्ब्रोस को ओवर में 4 गेंदें शेष रहते स्ट्राइक दी पर अब क्या किया जा सकता था।

केन्जिंगटन ओवल में उपस्थित वेस्ट इंडीज़ समर्थकों को जिस बात का भय सबसे अधिक था, वही दृश्य अब सामने था। नम्बर 11 पर आने वाले खिलाड़ियों की एकादश में भी जिन्हें 11वाँ क्रमांक मिले, टेस्ट क्रिकेट में सबसे अधिक बार शून्य पर आउट होने के कीर्तिमानधारी कोर्टनी वॉल्श बल्लेबाजी करने आ रहे थे। तनाव कम करने के लिए वॉल्श ने दिन का खेल बालकनी में बैठे अपने साथियों से दूर ड्रेसिंग रूम में टेलीविजन स्क्रीन पर देखा था पर नियति ने उन्हें पिच पर पहुँचा ही दिया। विश्व के सर्वश्रेष्ठ और सबसे घटिया बल्लेबाज, वर्तमान कप्तान और पूर्व कप्तान अब एक साथ थे।

गिलेस्पी के ओवर में अभी भी तीन गेंदें शेष थीं। वॉल्श स्ट्राइक पर, पहली गेंद ऑफ स्टम्प से बाहर। वॉल्श ने गेंद को सुरक्षित ढंग से छोड़ दिया पर ये नो बॉल निकली, एक रन तो मिला पर वॉल्श को अभी भी 3 गेंदों का सामना करना था। वॉल्श ने तीनों गेंदों को रोक दिया। उनके प्रत्येक ब्लॉक के साथ दर्शक दीर्घा में हर्ष बढ़ता जा रहा था।

5 रनों की आवश्यकता, लारा स्ट्राइक पर। मक्ग्रा की पहली गेंद लारा के बल्ले का किनारा लेकर स्लिप की दिशा में गई। पहली स्लिप में खड़े वॉर्न ने डाइव लगाई पर गेंद उनसे दूर थी, दो रन आए। 3 रनों की आवश्यकता। इस समय दबाव इतना अधिक था कि ग्लेन मक्ग्रा जैसे गेंदबाज ने ऑफ स्टम्प के बाहर वाइड फेंक दी। स्टीव वॉ चुपचाप देख रहे थे। लारा ने अगली गेंद पर हुक किया, गेंद फाइन लेग सीमारेखा से पहले रोकी गयी पर लारा दूसरे रन के लिए वापस न आ सके।

स्कोर बराबर हो गए थे, ब्रायन लारा ने दोनों भुजाएँ उठाकर पवेलियन में उपस्थित अपने साथियों को आश्वस्त किया और वॉल्श को गले लगाया।

कोर्टनी वॉल्श को मक्ग्रा की अंतिम गेंद रोकनी थी। तीन स्लिप, दो गली, एक लेग गली, एक फॉरवर्ड शॉर्ट लेग। ओवर द विकेट से ग्लेन मक्ग्रा। ऑफ स्टम्प के बाहर रही इस गेंद को वॉल्श ने सुरक्षित ढंग से छोड़ दिया। 0*(5) यह वॉल्श के करियर की सबसे महत्त्वपूर्ण पारी थी। अब मैच का परिणाम क्या होगा इसमें कोई शंका नहीं रह गयी थी।

Marshalling his troops to Victory:
149 पर अविजित ब्रायन लारा अब गिलेस्पी के सामने स्ट्राइक पर थे। फ़िल्म बनती तो कदाचित यह दिखाया जाता कि लारा के मस्तिष्क में पिछले कुछ महीने का घटनाक्रम चल रहा है। गिलेस्पी ओवर द विकेट से, ऑफ स्टम्प के बाहर हाफ वॉली, ब्रायन लारा की चिर परिचित विस्फोटक कवर ड्राइव, गेंद सीमारेखा की ओर अग्रसर। लारा एक स्टम्प उखाड़कर दौड़ पड़े। दोनों भुजाएँ उठाए हुए, एक में बल्ला दूसरे में एक स्टम्प। दर्शक और वेस्ट इंडियन खिलाड़ी भी मैदान में दौड़ पड़े और ब्रायन लारा को कंधों पर उठा लिया।

विज्डन ने लिखा “He guided his men to victory as though leading the infirm through a maze”

कोई संदेह नहीं था कि यह टेस्ट इतिहास में लक्ष्य का पीछा करते हुए खेली गई महानतम पारी थी। यदि सबाइना पार्क के 213 ने वेस्ट इंडीज़ को श्रृंखला में पुनर्जीवित किया था तो इस पारी ने लगभग हारे हुए मैच में विजयी बनाकर इस श्रृंखला में वेस्ट इंडीज़ को 2-1 की बढ़त दिला दी थी।

ब्रायन लारा ने बाद में रहस्योद्घाटन करते हुए कहा कि 5वें दिन का खेल आरम्भ होने से पहले वे जो “Shadow Batting” कर रहे थे, उसकी प्रेरणा उन्हें उनके स्कूल के मित्र निकलस गोमेज से मिली थी। जिन्होंने उन्हें बास्केटबॉल के महानतम खिलाड़ी माइकल जॉर्डन की पुस्तक “For the love of the game: my story” दी थी। जिसमें जॉर्डन ने “Visualisation” की तकनीक के विषय में बताया था। लारा कहते हैं, पुस्तक में एक पूरा पृष्ठ था जिसमें जॉर्डन बताते हैं कि कैसे वे कल्पना में देखते हैं कि मैच में क्या होने वाला है और उस स्थिति में वे क्या कर रहे होंगे।

एन्टीगा में हुए चतुर्थ और अंतिम टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया के 303 रनों के उत्तर में वेस्ट इंडीज़ ने 20 रन पर 2 विकेट गँवा दिए। ब्रायन लारा ने क्रमांक 4 पर आकर मात्र 82 गेंदों में एक विस्फोटक शतक लगाया परंतु अन्य बल्लेबाजों से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला और वेस्ट इंडीज़ मात्र 211 पर सिमट गई। (तीसरे विकेट की 115 रनों की साझेदारी में 100 रन लारा के थे) अंत में 176 रनों से मैच जीतकर ऑस्ट्रेलिया ने श्रृंखला 2-2 से बराबर कर ली। चूँकि ऑस्ट्रेलिया ने इन दोनों टीमों के बीच हुई पिछली श्रृंखला 3-2 से जीती थी अतः “सर फ्रैंक वॉरेल ट्रॉफी” ऑस्ट्रेलिया के पास ही रही।

2-2 से बराबरी वेस्ट इंडीज़ के लिए बहुत अच्छा परिणाम था। श्रृंखला से पूर्व वेस्ट इंडीज़ टीम जिस स्थिति में थी, उसमें 0-4 की पराजय भी चकित नहीं करती और ब्रायन लारा के ऐतिहासिक प्रदर्शन के बिना स्कोर कदाचित 0-4 ही होता।

ब्रायन लारा ने श्रृंखला में 91 की औसत से सर्वाधिक 546 रन बनाए और मैन ऑफ द सीरीज रहे। श्रृंखला से पूर्व रैंकिंग में वे पाँचवें स्थान पर थे और श्रृंखला के पश्चात प्रथम स्थान पर आ गए। [विपक्षी कप्तान स्टीव वॉ जो श्रृंखला से पूर्व रैंकिंग में प्रथम स्थान पर थे, उन्होंने भी अद्भुत बल्लेबाजी की थी और 409 बनाए पर वे दूसरे स्थान खिसक गए।]

ग्लेन मक्ग्रा ने 4 मैचों में 34 विकेट लिए, जिसमें 3 बार उन्होंने लारा को आउट किया परंतु लारा ने भी अपने 546 में से 125 रन मक्ग्रा के विरुद्ध बनाए। 2007 में एक साक्षात्कार में ब्रायन लारा ने कहा कि यह उनके जीवन की सर्वश्रेष्ठ श्रृंखला थी।

Via-

  1. James Fuller की पुस्तक “Brian Lara- An Unauthorised Biography”
  2. 1999 सर फ्रैंक वॉरेल श्रृंखला की यूट्यूब हाइलाइट

प्रिंस ऑफ ट्रिनिडाड ब्रायन चार्ल्स लारा कल 53 वर्ष के हो जाएंगे। उन्हें जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ।

चित्र- Getty Images

“What’s this little fat turd’s name?”

1989 में ऑस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाज रॉडनी हॉग मेलबर्न में एक जिला स्तरीय टूर्नामेंट में Waverly Dandenong के कोच और कप्तान थे। सामने वाली टीम थी St Kilda Cricket Club की। हॉग ने टॉस जीता था, वे अपने बल्लेबाजों द्वारा St Kilda के गेंदबाजों की धुलाई और स्कोर 125/1 देखकर स्वयं को टॉस जीतने की बधाई दे रहे थे।

The Mystery Blond:
गेंद सौंपी गई सुनहरे बालों वाले एक खिलाड़ी को। हॉग ने अपने साथी ब्रेंडन मकार्डल से पूछा, “What’s this little fat turds’ name?” ब्रेंडन ने कहा, “I don’t know” हॉग ने कहा, “For goodness sake, fellas, we’re playing district cricket — someone grab Friday’s paper.” पूरी टीम का नाम पढ़ा गया, एकमात्र उस “Little fat turd” का नाम नहीं मिला।

हॉग कहते हैं उनकी टीम 125/1 से 165/8 हो गई और उस “Little fat turd” ने 15 रन देकर 4 विकेट लिए।

एक वर्ष के उपरांत जब शेन वॉर्न विक्टोरिया राज्य की टीम के लिए अपना पदार्पण कर रहे थे तब रॉडनी हॉग ने समाचारपत्र “Melbourne Truth” में प्रकाशित अपने स्तंभ में लिखा कि यह लड़का 500 टेस्ट विकेट लेगा।

सम्पादक ने हॉग को निकाल दिया क्योंकि उन्हें लगता था कि ये आदमी अब कुछ भी बकवास करने लगा है। हॉग विनोद करते हुए कहते हैं, हो सकता है संपादक जानते थे कि उन्होंने 200 विकेट कम बताए हैं। “I got the sack from Truth newspaper because they reckoned I was writing a load of crap — the paper was full of crap! Maybe they knew I was about 200 wickets short.”

साभार- The Australian Age में 27 दिसम्बर 2007 को प्रकाशित Peter Hanlon एवं Martin Blake का लेख “The shady past of wide-brim Warney”

चित्र: Getty Images

Give the ball to Warnie, he’s got a lot of magic in that right palm.

महान खिलाड़ी कई होते हैं पर क्या आप उस समय अपनी महानता का प्रदर्शन कर सकते हैं, अपनी शक्तियों का आह्वान कर सकते हैं, जब मंच बड़ा हो, आपकी टीम संकट में हो, आपके साथी आपसे किसी चमत्कार की आशा कर रहे हों?

शेन वॉर्न ने ऐसा बारम्बार किया। जब भी ऐसे अवसर आए, शेन वॉर्न अधिकांश अवसरों पर अपनी टीम को विजय द्वार के पार ले गए। उनकी हथेली में जो जादू था वह तो था ही, उसके साथ साथ वे मानसिक रूप से भी काफी मजबूत खिलाड़ी थे। आत्मविश्वास ऐसा कि जहाँ टीम का हर सदस्य ड्रॉ या पराजय की सोच रहा हो वहाँ शेन वॉर्न विजय की सोच रहे होते थे।

ऐलन बॉर्डर, मार्क टेलर, स्टीव वॉ और रिकी पॉन्टिंग वे भाग्यशाली ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रहे जिनके पास शेन वॉर्न जैसा अस्त्र था। लेग स्पिनरों को लय में आने में दो तीन ओवर लगते हैं, शेन वॉर्न अपनी पहली गेंद से ही लय में होते थे, उनके पास अद्भुत नियंत्रण था।

विकेट चाहिए, गिव द बॉल टू वॉर्नी। रन रोकने हैं, गिव द बॉल टू वॉर्नी। हर समस्या का एक उपाय, गिव द बॉल टू वॉर्नी।

ऐडिलेड ऐशेज टेस्ट 2006 के चौथे दिन संध्याकाल तक मैच की तीसरी पारी में इंग्लैंड का स्कोर था 59/1, बढ़त 97 रनों की। यह मैच एक एक उबाऊ ड्रॉ की ओर बढ़ रहा था। विकेट अभी भी बल्लेबाजी के लिए बढ़िया थी। [इंग्लैंड ने पहली पारी में 551 रन पर पारी घोषित की थी, प्रत्युत्तर में ऑस्ट्रेलिया ने 513]

माइकल क्लार्क कहते हैं कि शेन वॉर्न ने उनसे कहा “हम यह मैच जीत रहे हैं।” क्लार्क सोच रहे थे कि किस प्रकार हम पहले इंग्लैंड को आउट करेंगे और उसके बाद क्या हमारे पास पर्याप्त समय होगा इस रन चेज के लिए। शेन वॉर्न को इंग्लैंड के विरुद्ध खेलने का बहुत लंबा अनुभव था, उन्होंने कहा मुझे इंग्लिश क्रिकेटरों की मानसिकता का पता है, वे ड्रॉ के लिए ही खेलेंगे। हमें बस इनके रन नहीं बनने देने। [इस मैच की पहली पारी में शेन वॉर्न को 53 ओवर में 167 रन देकर मात्र 1 विकेट मिला था। ]

अगले दिन के दसवें ओवर में ऐंड्रू स्ट्राउस के रूप में इंग्लैंड का पारी का दूसरा विकेट गिरा। तीन ओवर बाद इयन बेल रन आउट हुए पर जब शेन वॉर्न ने पहली पारी में 158 बनाने वाले केविन पीटरसन को पैरों के पीछे से बोल्ड कर दिया तब पूरा ऐडिलेड ओवल कोलाहल से व्याप्त हो गया। वॉर्न की ऊर्जा उनके साथियों में भी आ चुकी थी। ब्रेट ली ने शीघ्र ही फ्लिंटॉफ का विकेट लिया। भोजनावकाश तक स्कोर 89 पर 5. चायकाल तक इंग्लैंड 129 पर ऑल आउट। बढ़त 167 रनों की। शेन वॉर्न ने दोनों सत्र में लगातार गेंदबाजी की थी, उन्होंने 32 ओवरों में मात्र 49 रन देकर 4 विकेट लिए थे।

क्लार्क कहते हैं जैसे ही इंग्लैंड की टीम ऑल आउट हुई, वॉर्न ने उनसे कहा, “I told you we would win this test match.” ऑस्ट्रेलिया ने एकदिवसीय अंदाज़ में खेलते हुए 33वें ओवर में इस लक्ष्य को मात्र 4 विकेट की क्षति पर प्राप्त कर लिया। यह टेस्ट “Amazing Adelaide” के नाम से प्रसिद्ध है।

पूर्व कप्तान मार्क टेलर कहते हैं कि यदि आपकी टीम में शेन वॉर्न हों तो सदैव आपके पक्ष में कुछ न कुछ घटित होने की संभावना रहती है।

1996 विश्वकप का सेमीफाइनल ऑस्ट्रेलिया के हाथों से लगभग निकल चुका था। 208 के लक्ष्य का पीछा करते हुए वेस्ट इंडीज़ का स्कोर 41 ओवर में 165/2 था। अंतिम 9 ओवरों में 43 रनों की आवश्यकता और 8 विकेट शेष। यहाँ से ऑस्ट्रेलिया ने यह मैच 5 रनों से जीत लिया, मैन ऑफ द मैच शेन वॉर्न की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही, उन्होंने 9 ओवरों में 36 रन देकर 4 विकेट लिए।

1999 विश्वकप सेमीफाइनल में भी उनका प्रदर्शन उत्कृष्ट रहा। 214 के लक्ष्य का पीछा करते हुए दक्षिण अफ्रीका ने 12 ओवर में बिना विकेट के 48 रन बना लिए थे। 13वें ओवर में गेंदबाजी करने आए वॉर्न ने दूसरी ही गेंद पर हर्शल गिब्स को बोल्ड कर दिया और अगले ओवर में गैरी कर्स्टन और हैंसी क्रोनिए को आउट कर स्कोर 53/3 कर दिया। 45वें ओवर में शेन वॉर्न ने अच्छा खेल रहे शॉन पॉलक का विकेट लेकर ऑस्ट्रेलिया की स्थिति और सशक्त की। उन्होंने इस मैच में 10 ओवरों (जिनमें 4 मेडन थे) 29 रन देकर 4 विकेट लिए और मैन ऑफ द मैच रहे। फाइनल में उन्होंने पाकिस्तान के विरुद्ध 9 ओवरों में 33 रन देकर 4 विकेट लिए और पुनः मैन ऑफ द मैच रहे।

शेन वॉर्न क्रिकेट इतिहास के महानतम स्पिनर ही नहीं बल्कि महानतम गेंदबाज हैं। उनके आँकड़े तो अद्भुत थे ही पर वे आँकड़ों से कहीं बढ़कर थे। वे क्रिकेट के सबसे बड़े शो-मैन थे। शेन वॉर्न को खेलते देखना एक सुखद अनुभव था।

ॐ शांतिः 🙏

(चित्र: Getty Images)

Botham’s Ashes Part 3: Edgbaston 1981: “The Forgotten Miracle, An Overshadowed Masterpiece.”

एजबेस्टन 1981 सदैव ऐसे टेस्ट मैच के रूप में स्मरण किया जाएगा जिसे ऐशेज इतिहास के महानतम टेस्ट मैच (हेडिंग्ली 1981) के समीप (मात्र 9 दिन के अंतराल पर) घटित होने के कारण क्रिकेट प्रशंसकों द्वारा अपेक्षाकृत कम भाव मिला। रोमांच के मापदंड पर दोनों टेस्ट मैच एक दूसरे से कड़ी प्रतियोगिता करते दिखते हैं, परंतु हेडिंग्ली टेस्ट की पृष्ठभूमि ऐसी थी कि वह टेस्ट आज भी क्रिकेट प्रशंसकों के स्मृतिपटल पर अंकित है, वह इंग्लिश क्रिकेट इतिहास का ऐसा स्वर्णिम अध्याय है जिसकी चमक में एजबेस्टन टेस्ट कहीं खो सा गया।


हेडिंग्ली में एक सार्वकालिक महान प्रदर्शन के उपरांत एजबेस्टन में पहले तीन दिन इयन बोथम का प्रदर्शन अत्यंत निराशाजनक रहा। उन्होंने दोनों पारियों में कुल 29 (26+3) रन बनाए थे और पहली पारी में मात्र 1 विकेट लिया था। दूसरी पारी में अभी तक उन्होंने 9 ओवरों में मात्र 10 रन दिये थे पर विकेटहीन रहे थे।

स्कोर 114/5: ऑस्ट्रेलिया 151 के विजयलक्ष्य से मात्र 37 रन दूर थी। 5 विकेट शेष थे। मार्टिन केंट और विकेटकीपर बल्लेबाज रॉड मार्श पिच पर थे। इंग्लिश कप्तान माइक ब्रेयरली ने इयन बोथम को गेंद थमा दी।

तीन दिन पीछे चलते हैं।

हेडिंग्ली की दूसरी पारी में 75 गेंदों में 56 रनों की पारी खेलने वाले और इयन बोथम के साथ प्रत्याक्रमण से परिपूर्ण 117 रनों की अमूल्य साझेदारी करने वाले  ग्रैहम डिली को एकादश में स्थान नहीं मिला था। उनके स्थान पर दाएँ हाथ के ऑफ स्पिनर जॉन एम्ब्युरी को एकादश में लाया गया। कारण यह था कि एजबेस्टन की पिच द्वारा स्पिन गेंदबाजों से मित्रवत व्यवहार की आशा थी।

माइक ब्रेयरली ने टॉस जीतकर बल्लेबाजी का निर्णय लिया था। हेडिंग्ली में क्रमांक 3 पर खेलने वाले ब्रेयरली ज्योफ्री बॉयकॉट के साथ पारी का आरम्भ करने आए। डेविड गावर 3 पर आए और अबतक ओपनर रहे ग्रैहम गूच 4 पर खेले।

डेनिस लिली को पिच से विशेष सहायता नहीं मिल रही थी पर टेरी ऑल्डरमन ने सही लाइन और लेंथ पर गेंदबाजी की और 42 रन देकर 5 विकेट लिए। इंग्लैंड की पहली पारी 189 पर सिमट गई। माइक ब्रेयरली 48 रन बनाकर सर्वोच्च स्कोरर रहे। यह इस मैच का सर्वोच्च निजी स्कोर रहा। (ब्रेयरली के 39 टेस्ट के  करियर में यह एकमात्र अवसर रहा जब वे मैच के सर्वोच्च स्कोरर रहे।)

ऑस्ट्रेलिया की पहली पारी 69 रनों की बढ़त के साथ 258 पर समाप्त हुई। दूसरी पारी में जब बोथम के रूप में इंग्लैंड का 6ठा विकेट मात्र 115 के स्कोर पर गिरा तब बढ़त मात्र 46 रन थी। यहाँ से माइक गैटिंग के 39, क्रिस ओल्ड के 23 और ऑफ स्पिनर जॉन एम्ब्युरी के अविजित 37 रन के महत्वपूर्ण योगदानों के बलपर इंग्लैंड ने 150 रनों की बढ़त ली। ऑस्ट्रेलिया के समक्ष 151 रनों का लक्ष्य। तीसरे दिन का खेल समाप्त होने तक ऑस्ट्रेलिया का स्कोर था 9 रन पर 1 विकेट।

2 अगस्त 1981, चौथा दिन, Super Sunday: अबतक हुए टेस्ट मैचों में तीसरे दिन के उपरांत एक दिन का विश्राम होता था परंतु उस टेस्ट में विश्राम न लिया गया। निर्णय हुआ कि रविवार के दिन का खेल अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ विलंब से आरम्भ हो।

एजबेस्टन में उपस्थित अंग्रेज दर्शक हेडिंग्ली की पुनरावृत्ति की संभावनाओं का विचार करते हुए प्रफुल्लित हो रहे थे परंतु कप्तान माइक ब्रेयरली आज इतने आशावादी नहीं थे। उन्होंने कहा है,  “I was more doubtful; lightning doesn’t, does it, strike twice?” यद्यपि हेडिंग्ली की तुलना में इंग्लैंड के पास 21 रन अधिक थे पर ब्रेयरली की चिंता का कारण थी एजबेस्टन की पिच जो अभी भी बल्लेबाजी हेतु अनुकूल थी।

हेडिंग्ली के दूसरे नायक बॉब विलिस ने पहली पारी में कोई सफलता प्राप्त नहीं की थी और कई नो बॉल फेंकी थीं। (जिसके लिए वे कुख्यात थे।) चौथे दिन के प्रथम सत्र में विलिस ने हेडिंग्ली का स्मरण कराया एवं ओपनर जॉन डाइसन और कप्तान किम ह्यूज्स को पवेलियन वापस भेजते हुए ऑस्ट्रेलिया का स्कोर 29/3 कर दिया। एजबेस्टन पूर्णतः उत्साहित। भविष्य के कप्तान ऐलन बॉर्डर और ग्रैहम यैलप ने सम्भलकर खेलते हुए भोजनावकाश तक और कोई विकेट नहीं गिरने दिया, स्कोर 62/3.

“Get your bowling boots on”:
इयन बोथम ने अभी तक कुछ ओवर फेंके थे और उन्हें कोई सफलता नहीं मिली थी। अब वे आत्मसंशय में थे और आगे गेंदबाजी करने के इच्छुक नहीं थे। भोजनावकाश के पश्चात जब टीमें मैदान में लौट रही थीं तब विकेटकीपर बॉब टेलर ने देखा कि बोथम अपने “बॉलिंग बूट्स” नहीं बल्कि “नाइकी टेनिस शूज” पहन रहे हैं। कप्तान ब्रेयरली ने इसका कारण पूछा तो बोथम ने कहा, “You’re all right captain. You don’t want me to bowl.” यह कहकर बोथम जूते पहनने लगे, वे वास्तव में गेंदबाजी करने से हिचक रहे थे। कप्तान ब्रेयरली की आवाज़ बदल गई, उन्होंने आदेशात्मक स्वर में कहा, “Get your bowling boots on.” बॉब टेलर कहते हैं, कोई अन्य कप्तान होता तो बोथम से दब जाता और इसके बाद बोथम को कोई समस्या भी नहीं झेलनी पड़ती, पर ब्रेयरली अन्य से भिन्न थे।

भोजन के कुछ समय पश्चात ऑफ स्पिनर जॉन एम्ब्युरी ने ग्रैहम यैलप को बोल्ड कर दिया और कुछ ही समय बाद उन्होंने एक भयानक उछाल लेती हुई गेंद से ऐलन बॉर्डर का विकेट लेकर ऑस्ट्रेलियाई दल की आशाओं पर तुषारापात कर दिया। स्कोर 105 पर 5. (105 पर 5, यह इंग्लिश क्रिकेट में एक बहुत महत्त्वपूर्ण आँकड़ा है। हेडिंग्ली में जब इयन बोथम बल्लेबाजी के लिए आए थे तब इंग्लैंड का स्कोर 105 पर 5 ही था। इसके पश्चात जो घटित हुआ, वह ऐतिहासिक था।) बॉर्डर ने 175 गेंदों में 40 रन बनाए और उनके विकेट के साथ “Floodgates” खुलने की आशंका में वृद्धि हुई।

Still strangely dissident:
माइक ब्रेयरली विचार कर रहे थे कि एम्ब्युरी का साथ देने के लिए दूसरे छोर से किसे गेंद दी जाए। इयन बोथम आश्चर्यजनक रूप से अभी भी आत्मसंशय में थे और चाहते थे कि अन्य लोग गेंदबाजी करें। बोथम इस समय आत्मविश्वासहीन थे, संभवतः इस मैच में अबतक के अपने प्रदर्शन के कारण। उन्होंने कप्तान को सुझाव दिया कि पीटर विली जो उपयोगी ऑफ स्पिन करा लेते हैं, उन्हें दूसरे छोर से लगाया जाए।

माइक ब्रेयरली इस प्रकार का कोई भी सुझाव मानने वाले नहीं थे। बोथम कहते हैं, “Brears (Brearley) played one of his hunches and tossed me the ball.”  इसके पश्चात जो हुआ वह अविश्वसनीय था। अगले 5 ओवरों में इयन बोथम ने 1 रन देकर 5 विकेट ले लिए।

बोथम की गेंद को लेग साइड में खेलने के प्रयास में रॉड मार्श का मिडिल स्टम्प उखड़कर बाहर हो गया। एजबेस्टन सहस्रों दर्शकों के कोलाहल से व्याप्त। माइक्रोफोन पर रिची बेनो, “The crowd has gone noisily berserk.” रॉड मार्श आज भी अपने इस शॉट को भूल नहीं पाये हैं।

अगली गेंद नीची रही और रे ब्राइट एलबीडबल्यू। डेनिस लिली ने हैट्रिक तो रोक ली पर शीघ्र ही ड्राइव लगाने के प्रयास में वे विकेट के पीछे पकड़े गए, गेंद इतनी दूर थी कि यदि लिली इस गेंद को छोड़ देते तो ये वाइड हो सकती थी।

मार्टिन केंट अंतिम ख्यातिप्राप्त बल्लेबाज थे। ब्रेयरली उन्हें एक रन देकर रॉडनी हॉग को स्ट्राइक पर लाना चाहते थे। केंट ने गेंद को लेग साइड में क्लिप करने का प्रयास किया पर गेंद उनके पैड को स्पर्श करते हुए ऑफ स्टंप पर लगी।

इस श्रृंखला पर लिखी अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “Phoenix From The Ashes” में माइक ब्रेयरली ने लिखा है, “With the sense of flair that makes him a great cricketer, he sensed his chance and grabbed it. Each time he took a wicket his arms reached up, his chest filled, waist drawn in.”

नम्बर 11 टेरी ऑल्डरमन अंतिम विकेट बनने के लिए क्रीज पर आ चुके थे। पहली गेंद पर उन्होंने ड्राइव का प्रयास किया, गेंद बल्ले के आंतरिक किनारे के पास से निकली। दूसरी गेंद पर भी यही प्रयास, इस बार गेंद बाहरी किनारे के पास से निकली। तीसरी गेंद, स्टंप की लाइन में, ऑल्डरमन गति से परास्त हुए और गेंद स्टंप पर जा लगी। ऑस्ट्रेलिया 121 ऑल आउट। इंग्लैंड 29 रनों से विजयी।

बोथम एक स्टम्प उखाड़कर मैदान में दौड़े आ रहे दर्शकों से बचते हुए ड्रेसिंग रूम की ओर भागे।  यह स्पेल:  5 ओवर, 4 मेडन, 1 रन और 5 विकेट। ऑस्ट्रेलिया के अंतिम 7 विकेट 34 रनों, अंतिम 6 विकेट 16 रनों और अंतिम 5 विकेट मात्र 7 रनों के अंदर गिरे। (87 पर 3, 105 पर 4 और 114 पर 5 से 121 ऑल आउट)

“Just keep it tight for Embers.” ब्रेयरली ने इस स्पेल के लिए बोथम को गेंद थमाते हुए यह बात कही थी, जिसका ध्वन्यार्थ था कि जॉन एम्ब्युरी विकेट लेंगे, तुम दूसरे छोर से रन मत देना। बोथम ने अपने कप्तान की बात मानने के साथ साथ बचे हुए सभी विकेट भी ले लिए। निश्चित रूप से ब्रेयरली जानते थे कि बोथम का कौन सा तार कब छेड़ना है।

साढ़े तीन बजे ऑस्ट्रेलियाई टीम एक सरल विजय की ओर बढ़ रही थी। एक घण्टे के अंदर इंग्लिश खिलाड़ी एजबेस्टन की बालकनी में विजयोत्सव मना रहे थे।

इंग्लिश टीम में मैन ऑफ द मैच के पुनः दो प्रतियोगी थे। ऑफ स्पिनर जॉन एम्ब्युरी जिन्होंने पहली पारी में मात्र 43 रन देकर 4 विकेट लिए और ऑस्ट्रेलियाई बढ़त को 69 पर सीमित करने के पश्चात इंग्लैंड की दूसरी पारी में 37 रनों का महत्त्वपूर्ण योगदान देते हुए इंग्लिश बढ़त को 150 तक पहुँचाया। तदोपरांत अंतिम पारी में बॉर्डर और यैलप के रूप में मध्यक्रम के दो महत्त्वपूर्ण विकेट लिए। सबसे बड़ी बात यह कि चौथे विकेट की 58 रनों की साझेदारी को तोड़ा, जो मैच को इंग्लैंड से दूर लेकर जा रही थी। एम्ब्युरी का योगदान बहुमूल्य था परंतु इयन बोथम ने जिस प्रकार अपने 5 ओवर के स्पेल में मैच का परिणाम पूर्ण रूप में परिवर्तित कर दिया, इस कारण उन्हें मैन ऑफ द मैच चुना गया।

ग्रैहम गूच ने कहा, “He plucked that game from nowhere. He won it with sheer magnetism. He got into the Australians minds again.”

बोथम भी इस बात से सहमत दिखे, “They didn’t lose the game because I bowled brilliantly. They lost because they were mentally shot.”

ऑस्ट्रेलियाई कप्तान किम ह्यूज्स ने स्वीकार किया, “We fell apart under pressure. I’ll have to think how I can lift the team.” (वे ऐसा करने में अक्षम रहे)

जो दर्शक यह मैच टेलीविजन पर देख रहे थे, उन्हें प्रतीक्षा करनी पड़ी क्योंकि BBC TV ने टेस्ट मैच का प्रसारण मध्य में ही रोककर “British Motorcycling Grand Prix” का प्रसारण आरम्भ कर दिया था। चकित और निराश क्रिकेटप्रेमी दर्शक से श्रोता बनकर “Test Match Special” की रेडियो कॉमेंट्री से संतोष करने को विवश थे। जबतक BBC TV एजबेस्टन की ओर मुड़ा तबतक टेस्ट मैच समाप्त हो चुका था।

साभार:

1. The Guardian में जुलाई 2013 में प्रकाशित John Ashdown का लेख, “Edgbaston 1981: The Forgotten Miracle.”

2. ESPN Cricinfo पर जुलाई 2015 में प्रकाशित मार्टिन विलियमसन का लेख “Beefy’s 28-ball Ashes broadside.”

3. क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया का यूट्यूब वीडियो “Botham’s Bullring.”

4. माइक ब्रेयरली की पुस्तक “Phoenix from the Ashes”

5. BBC की डॉक्यूमेंट्री “Botham’s Ashes”

चित्र: Getty Images

5वाँ टेस्ट ओल्ड ट्रैफर्ड, मैनचेस्टर में था। यहाँ बोथम की एक और अद्भुत शतकीय पारी आई, जिसके बल पर इंग्लैंड ने ऐशेज में 3-1 की निर्णायक बढ़त ले ली। इसपर विमर्श अगले भाग में।

To be continued…..

Botham’s Ashes Part 2: “The Miracle of Headingley ’81”

जुलाई 21, 1981, हेडिंग्ली: चौथी पारी में 37वें ओवर की पहली गेंद। माइक्रोफोन पर रिची बेनो, “Bowled him. It’s all over and it is one of the most fantastic victories ever known in Test Cricket history… England have won this match after one of the most astonishing fightbacks you can ever see.”.

1981 में इंग्लैंड में हुई ऐशेज को “Botham’s Ashes” के नाम से जाना जाता है। इस श्रृंखला में इयन बोथम ने इंग्लैंड के लिए न केवल 36.27 की औसत और 93.22 की स्ट्राइक रेट से सर्वाधिक 399 रन बनाए, प्रत्युत, 20.58 की औसत से सर्वाधिक 34 विकेट भी लिए। वे श्रृंखला में सर्वाधिक रन बनाने वालों में ऐलन बॉर्डर (533) के बाद द्वितीय और सर्वाधिक विकेट लेने वालों में टेरी ऑल्डरमन (42) और डेनिस लिली (39) के बाद तृतीय स्थान पर रहे।

पहले 2 टेस्ट मैचों के पश्चात 0-1 से पिछड़ने के उपरांत 6 मैचों की यह श्रृंखला इंग्लैंड ने 3-1 से जीती। तीनों ही बार इयन बोथम मैन ऑफ द मैच रहे और अंत में मैन ऑफ द सीरीज।

किसी एक खिलाड़ी का एक लंबी टेस्ट श्रृंखला पर ऐसा प्रभाव कदाचित ही देखा गया हो पर बोथम के लिए इस श्रृंखला का आरंभ बहुत अच्छा नहीं हुआ था। उन्होंने ट्रेंट ब्रिज में पहले टेस्ट में मात्र 34 रन बनाए थे, वहीं लॉर्ड्स में दूसरे टेस्ट में वे “राज-युग्म” (King Pair) (दोनों पारियों में शून्य) पर आउट हुए थे। कप्तानी का बोझ उनके लिए बहुत भारी सिद्ध हो रहा था। पिछले 13 महीनों में इंग्लैंड ने 12 में से एक भी टेस्ट नहीं जीता था (4 में पराजित, शेष ड्रॉ)। पिछले 12 टेस्ट में उनकी बल्लेबाजी औसत 40.48 से 29.85 पर आ चुकी थी। इन 12 टेस्ट की 21 पारियों में उन्होंने 13.14 की औसत से मात्र 276 रन बनाए थे। पिछली 20 पारियों में 4 शून्य और कोई अर्धशतक नहीं।

लॉर्ड्स टेस्ट के पश्चात बोथम ने कप्तानी त्याग दी थी और माइक ब्रेयरली को कप्तान नियुक्त किया गया था।

ऑस्ट्रेलियाई कप्तान किम ह्यूज्स ने टॉस जीतकर बल्लेबाजी का निर्णय लिया। पहले दिन का खेल समाप्त होने पर स्कोर था 210/3, ब्रेयरली को एक भाग्यशाली और कुशल कप्तान माना जाता है, आज उनसे इन दोनों में से किसी बात का परिचय नहीं मिला। ब्रेयरली सोच रहे थे कि उन्हें वापस नहीं आना चाहिए था।

जॉन डाइसन के शतक और किम ह्यूज्स के 89 रनों के बलपर ऑस्ट्रेलिया ने दूसरे दिन 401/9 के स्कोर पर पारी घोषित की थी। दूसरे दिन के खेल की समाप्ति के समय इंग्लैंड का स्कोर था 7 रन बिना किसी विकेट के। ऑस्ट्रेलियाई तीव्र गेंदबाज इंग्लैंड पर हावी थे और ग्रेग चैपल की अनुपस्थिति में ऑस्ट्रेलियाई कप्तान बने किम ह्यूज्स का ऐशेज ट्रॉफी प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त हो गया था। ह्यूज्स ने कहा था कि इस पिच पर 401 रन किसी अन्य पिच पर एक हजार रनों के बराबर हैं।

कप्तानी के बोझ से मुक्त होने के बाद बोथम ने न केवल गेंद से भी अच्छा प्रदर्शन करते हुए 6 विकेट (6-95) लिए बल्कि पहली पारी में सर्वाधिक 50 रन बनाए। इंग्लैंड की पहली पारी मात्र 174 पर समाप्त हुई। ह्यूज्स की बात सत्य सिद्ध हो रही थी।

किम ह्यूज्स 227 रनों की बढ़त पाकर अत्यंत हर्षित थे। उन्होंने इंग्लैंड को फॉलोऑन खेलने के लिए आमंत्रित किया।

500-1:
स्विंग गेंदबाज टेरी ऑल्डरमन ने ट्रेंट ब्रिज टेस्ट में पदार्पण करते हुए 9 विकेट लिए थे। हेडिंग्ली टेस्ट के चौथे दिन जब उन्होंने इंग्लिश विकेटकीपर बॉब टेलर को शॉर्ट लेग पर कैच कराया तब इंग्लैंड का स्कोर हो गया, 135 पर 7 विकेट। अभी भी ऑस्ट्रेलिया के पहली पारी के स्कोर से 92 रन पीछे और मात्र 3 विकेट शेष।

बेटिंग और गैंब्लिंग कम्पनी “Ladbrokes” के अनुसार ऑस्ट्रेलिया की विजय के Odds थे 1–4, ड्रॉ के 5–2 और इंग्लैंड की विजय के 500–1. ये Odds पूर्व इंग्लिश और केंट विकेटकीपर गॉडफ्रे एवंस और कम्पनी के डायरेक्टर रॉन पॉलार्ड ने तैयार किए थे।

Dennis loves a bet:
डेनिस लिली ने मजे लेने के लिए इंग्लैंड की जीत पर 10 पाउंड और रॉड मार्श ने 5 पाउंड लगा दिए थे। लिली तो टीम के कोष से 50 पाउंड लगाना चाहते थे, टीम के अन्य सदस्य उनपर हँस पड़े पर लिली को मजे लेने का मन इतना अधिक था कि उन्होंने अपनी जेब से 10 पाउंड लगा दिए। ड्रेसिंग रूम में पूरी टीम हँस हँस के पागल हो रही थी। अन्य ख़िलाडियों ने दाँव पर चिल्लर लगाने शुरू किए। कोच पीटर फिलपॉट कहते हैं, “Lots of guys threw in their small change. I think I threw in a couple of bob myself. Everyone was killing themselves laughing.”

इस बात पर हम पोस्ट के अंत में लौटेंगे।

Graham Dilley attacks:
क्रमांक 9 पर आए 21 वर्षीय ग्रैहम डिली से आशाएँ लगाना कोई बुद्धिमानी नहीं थी। डिली के लिए यह श्रृंखला अच्छी नहीं रही थी और वे सोच रहे थे कि इस मैच के उपरांत तो उन्हें बाहर होना ही है। अतः डिली ने प्रत्येक गेंद पर प्रहार का निर्णय का विचार किया। अधिकतर गेंदों से बल्ले का संपर्क नहीं हो रहा था परंतु जब सम्पर्क होता तक गेंद बहुत तीव्र गति से कवर बाउंड्री की ओर निकल रही थी और दूसरे छोर पर खड़े बोथम हर बार यह देखकर हँस रहे थे। चायकाल तक इंग्लैंड का स्कोर हो गया था 176 पर 7 पर अभी भी पारी की पराजय बचाने के लिए 51 रन आवश्यक। अबतक 41 रनों की साझेदारी में डिली ने 25 रन बनाए थे।

Botham goes bonkers:
चौथा दिन, अंतिम सत्र: आक्रमण का विचार कर चुके बोथम और डिली अब बस बल्लेबाजी का आनंद ले रहे थे। चाय के बाद अगले आधे घण्टे में उन्होंने 60 रन जोड़ दिए। बोथम ने 57 गेंदों में अपने 50 रन पूरे किए। अगली गेंद पर उन्होंने इंग्लैंड को बढ़त दिला दी और पारी से पराजय का भय समाप्त कर दिया। ग्रैहम डिली ने डेनिस लिली को दो अविरत चौके लगाए। दोनों ही अद्भुत स्ट्रोक। इयन बोथम ने कहा है कि उस दिन डिली को देखकर लग रहा था मानो गैहम दिली नहीं बल्कि स्वयं (महान दक्षिण अफ्रीकी बल्लेबाज) ग्रैम पॉलक खेल रहे हों।

ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों ने ऑफ स्टम्प के थोड़ा बाहर की लाइन पकड़ रखी थी यह सोचकर कि कितनी देर ये दोनों ऐसे खेलेंगे, सीम और स्विंग अन्ततोगत्वा अपना काम कर ही जाएगी पर भाग्य आज इयन बोथम के साथ था, जो किनारे लग रहे थे वो स्लिप के ऊपर से निकल रहे थे।

इयन बोथम गुड लेंथ गेंदों को या तो गेंदबाज के पास से चौके के लिए भेज रहे थे या मिडविकेट क्षेत्र में। शॉर्ट गेंदों पर वे पुल, हुक, स्क्वेयर कट, लेट कट, स्लिप के ऊपर से स्लाइस जैसे सभी शॉट्स का प्रयोग कर रहे थे।

अबतक के सारे शॉट्स “Showman Shots” थे, अब आया बोथम का इस मैच का सर्वश्रेष्ठ स्ट्रोक। टेरी ऑल्डरमैन की एक गुड लेंथ गेंद को उन्होंने मिड ऑन के ऊपर से उठा दिया 6 रनों के लिए।

दर्शक दीर्घा में उपस्थित श्रीमती केथी बोथम बहुत उत्साहित और प्रसन्न थीं, उनके साथ बैठी दो अन्य महिलाओं को यह शॉट उतना प्रिय नहीं लगा था, इसका कारण यह हो सकता था कि वे दोनों ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों (ऐलन बॉर्डर और ग्रैहम वुड) की पत्नियाँ श्रीमती जेन बॉर्डर और श्रीमती एंजेला वुड थीं।

बोथम और डिली की साझेदारी ने ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों को दबाव में ला दिया था। यह तब स्पष्ट हो गया जब जेफ लॉसन ने बोथम को एक ही ओवर में दो बीमर फेंके। बोथम ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, “I could accept one as an accident but two had to be more than coincidence. I stored them away in the memory banks for future reference.”

बोथम और डिली ने मात्र 80 मिनट की साझेदारी में 117 रन जोड़ दिए थे। इंग्लैंड की बढ़त अभी मात्र 25 की हुई थी कि टेरी ऑल्डरमन ने राउंड द विकेट जाकर डिली की गिल्लियाँ उड़ा दीं। डिली ने 75 गेंदों में 56 रन बनाए थे।

निश्चित रूप से अब मैच समाप्त हो चुका था। मात्र 25 रन की बढ़त और मात्र 2 विकेट हाथ में। कौन रोक सकता था ऑस्ट्रेलिया को ? कितना बड़ा चमत्कार चाहिए था मैच में किसी भी अन्य परिणाम के लिए ?

95 पर आ जाने के बाद जेफ़ लॉसन को दो अविरत चौके लगाकर बोथम ने अपना बल्ला ड्रेसिंग रूम में उपस्थित अपने साथियों की ओर दिखाया। बोथम का यह शतक मात्र 87 गेंदों में आया था। कप्तान माइक ब्रेयरली अब करतल ध्वनि बन्द करके बोथम की ओर उंगली से संकेत दे रहे थे। संदेश स्पष्ट था, “टिके रहो।” बोथम ने दो उंगलियों से V बनाते हुए कप्तान का उत्तर दिया। माइक्रोफोन पर रिची बेनो, “Mike Brearley is just giving him the word to stick around.”

बहुत देर तक गेंदबाजी कर चुके डेनिस लिली और टेरी ऑल्डरमन की टांगों में अब शक्ति शेष नहीं थी पर बोथम के कारण कप्तान किम ह्यूज्स स्पिनर रे ब्राइट को गेंद थमाने में डर रहे थे। (इंग्लिश तेज गेंदबाज बॉब विलिस ने कहा कि संभवतः बोथम ब्राइट की गेंद पर बाउंड्री पर कैच हो सकते थे। बोथम स्वयं इस बात से सहमत हुए।)

बोथम के 103 रन मात्र 87 गेंदों में आए थे। चायकाल के बाद वाले 64 रन में उन्होंने मात्र 2 सिंगल लिए थे (शेष 62 रन, 14 चौके और एक छक्के से)। ऐशेज में पिछले 60 वर्षों में पहली बार और बोथम के करियर में चौथी बार था उन्होंने टेस्ट मैच में शतक भी लगाया था और पारी में 5 (या अधिक) विकेट लिए थे और इस समय उनकी वय मात्र 25 वर्ष थी।

चौथे दिन का खेल समाप्त होने तक इंग्लैंड ने 124 रनों की बढ़त ले ली थी और बोथम 145 पर खेल रहे थे। अंतिम सत्र में इंग्लैंड ने 27 ओवरों में 175 रन बनाए जिसमें से 106 अकेले बोथम के थे। बोथम अबतक 26 चौके और एक छक्का लगा चुके थे। (10वें नम्बर पर आए क्रिस ओल्ड ने भी बोथम का अच्छा साथ देते हुए 29 रन बनाए थे। )

ऑस्ट्रेलियाई टीम बोथम के इस आक्रमण से कितनी प्रताड़ित हुई थी इसका पता इस बात से चलता है कि दिन के खेल की समाप्ति के पश्चात जब इंग्लिश विकेटकीपर बॉब टेलर ऑस्ट्रेलियाई ड्रेसिंग रूम में बैट साइन कराने गए तब आवाज़ आई, “F* off with your f*ing bats.”

Allsport के Adrian Murrell ने चौथे दिन के खेल के पश्चात ड्रेसिंग रूम में इयन बोथम का एक छायाचित्र लिया जो अब ऐतिहासिक और लोकगाथाओं का हिस्सा बन चुकी है। बोथम इसमें अपनी पूरी क्रिकेट किट पहने हुए मुँह में सिगार दबाए बैठे हैं।

अगले दिन बोथम ने मात्र एक चौका लगाया और नम्बर 11 बॉब विलिस के आउट होने के बाद वे 149 पर अविजित लौटे। 38 टेस्ट मैचों में यह बोथम का 7वाँ शतक और करियर का सर्वाधिक स्कोर था।

8वें विकेट के लिए 117, 9वें विकेट के लिए 67 और 10वें विकेट के लिए 37 रनों की साझेदारी के बाद इंग्लैंड की पारी 356 पर समाप्त हुई और ऑस्ट्रेलिया को 2-0 की बढ़त लेने के लिए 130 रनों का लक्ष्य मिला। (बोथम जब क्रीज पर आए थे तो इंग्लैंड का स्कोर था 105 पर 5 और पारी की हार से बचने के लिए 122 रन और बनाने थे।) बोथम के इस ऐतिहासिक प्रदर्शन के बाद भी अभी भी पलड़ा ऑस्ट्रेलिया का ही भारी था।

The Hero who almost didn’t play:


रॉबर्ट जॉर्ज डिलन विलिस अर्थात बॉब विलिस को इस टेस्ट मैच के लिए टीम में नहीं चुना जाना था। चयनकर्ताओं का मानना था वे फिट नहीं हैं। उन्होंने अपना स्ट्राइक बॉलर का पद गँवा दिया था और अत्यधिक नो बॉल फेंकने लगे थे, जिससे स्पष्ट था कि वे लय में नहीं हैं। पिछले दोनों टेस्ट में वे कुल 28 नो बॉल फेंक चुके थे। हेडिंग्ली टेस्ट की पहली पारी में उन्हें कोई विकेट नहीं मिला था। कप्तान माइकल ब्रेयरली ने पिछली रात मदिरापान के समय उन्हें नो-बॉल की चिंता न करके केवल तेज गेंदबाजी करने पर ध्यान देने को कहा था।

ऑस्ट्रेलियाई टीम बिना किसी कष्ट के लक्ष्य की ओर अग्रसर थी। स्कोर था 56 पर 1, मात्र 74 रनों की आवश्यकता। पहले पाँच ओवरों के स्पेल में बॉब विलिस को कोई विकेट नहीं मिला। प्रेस बॉक्स में बातें चल रही थीं कि बिना किसी चमत्कार के यह विलिस का इंग्लैंड के लिए अंतिम स्पेल हो सकता है।

भोजनावकाश से 20 मिनट पूर्व कप्तान ब्रेयरली ने विलिस का छोर बदला। (Rugby Stand End से Kirkstall Lane End) यह इस पारी में ब्रेयरली का संभवतः सबसे महत्वपूर्ण निर्णय था। छोर बदलते ही विलिस की गति बढ़ गई क्योंकि वे ढलान (Slope) की ओर गेंदबाजी कर रहे थे। विलिस की एक गेंद ने भयानक उछाल लिया और ट्रेवर चैपल के दस्ताने से लगकर हवा में उठ गई। विकेटकीपर बॉब टेलर के लिए एक सरल कैच। नम्बर 4 पर आए पिछली पारी में 89 बनाने वाले कप्तान किम ह्यूज्स, जो इस बार शून्य पर आउट हुए, उनका कैच बोथम ने तीसरी स्लिप में बायीं ओर डाइव लगाकर पकड़ा। BBC के लिए कॉमेंट्री कर रहे रिची बेनो के शब्द, “Everything is running for Botham. Runs, wickets and catches.” नए बल्लेबाज वामहस्त ग्रैहम यैलप, विलिस की एक और तीव्र बाउंसर, यैलप को चकित करती हुई, उनके बल्ले का आंतरिक किनारा लेकर शॉर्ट लेग की ओर गई। माइक गैटिंग ने अद्भुत हस्तलाघव का प्रदर्शन करते हुए कैच पकड़ा। विलिस ने मात्र 11 गेंदों में 3 विकेट ले लिए थे, इनमें से 2 तो लंच से ठीक पिछले ओवर में।

दूसरा सत्र: ढलान की ओर रन-अप लेते हुए बॉब विलिस से गेंदबाजी कराना नो-बॉल का संकट तो बढ़ा ही रहा था पर उन्हें फिर से दूसरे छोर से लाना कोई विकल्प ही नहीं था। ब्रेयरली ने विलिस से नो बॉल के बारे में विचार करना छोड़कर केवल तीव्र गति से गेंद करने पर ध्यान देने को कहा। विलिस अब इस पल में खो चुके थे, वे इंग्लैंड और अपना करियर दोनों को बचाने के लिए सब कुछ झोंक रहे थे।

माइक ब्रेयरली को अब विश्वास हो गया था कि बॉब विलिस लय में हैं और इसके पश्चात उनकी कप्तानी बिल्कुल उच्च स्तरीय रही। उन्होंने इसके बाद स्वयं को पहली स्लिप में ग्राहम गूच की जगह स्थापित कर दिया। गूच इस पूरी श्रृंखला में पहली स्लिप में फील्डिंग करते आ रहे थे और अपनी ओर आया लगभग हर कैच टपका चुके थे।

ऐलन बॉर्डर जो अब तक इस श्रृंखला में अच्छी बल्लेबाजी करते आए थे, तेज गेंदबाज क्रिस ओल्ड की एक गेंद को स्टम्प्स पर खेल बैठे। ऑस्ट्रेलिया का स्कोर 65 पर 5. ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजी क्रमांक में 4, 5 और 6 मात्र 20 गेंद खेलकर 0 का योगदान देकर पवेलियन लौट गए थे।

मैच में पहली बार ऐसा लग रहा था कि इंग्लैंड की विजय की संभावना बनी है। विलिस ने पहली पारी के शतकवीर जॉन डाइसन को विकेट के पीछे कैच कराया। विकेटकीपर बल्लेबाज रॉडनी मार्श बॉब विलिस को हुक करने के प्रयास में डीप फाइन लेग बाउंड्री पर कैच हुए। जेफ लॉसन (जो चोटिल थे) मात्र 2 गेंद टिक पाए। ऑस्ट्रेलिया का स्कोर 8 विकेट पर 75 रन, 55 रनों की आवश्यकता और मात्र 2 विकेट शेष। 58 मिनट में ऑस्ट्रेलिया ने मात्र 19 रन पर 7 विकेट गँवा दिए थे। इनमें से 6 विकेट बॉब विलिस के थे।

इंग्लैंड की टीम अब पहली बार इस मैच को जीतने के लिए फेवरेट थी परंतु ऑस्ट्रेलियाई आसानी से पराजय स्वीकार करने वाले नहीं थे। रे ब्राइट और डेनिस लिली की जोड़ी ने आक्रमण का विचार किया। लिली ने शॉर्ट गेंदों को स्लिप के ऊपर से अपर कट के माध्यम से चौके के लिए भेजना आरम्भ किया। ब्राइट ने क्रिस ओल्ड को दो चौके लगाए और मात्र 4 ओवरों में स्कोर 75 पर 8 से 110 पर 8 हो गया। इंग्लिश दल और दर्शकों में पुनः चिंता व्याप्त।

विलिस ने अब गेंद आगे फेंकनी आरम्भ की। विलिस की एक आउटस्विंगर को लिली ने फ्लिक करना चाहा पर पूरा सम्पर्क न होने के कारण गेंद हवा में उठ गई। मिड ऑन पर माइक गैटिंग गेंद के नीचे, हेडिंग्ली में उपस्थित सभी दर्शक साँस रोके प्रतीक्षारत। गैटिंग ने कैच को परखने में त्रुटि के पश्चात आगे आकर डाइव लगाकर किसी प्रकार कैच पकड़ा। लिली 15 गेंद में 17 रन बनाकर आउट। स्कोर 110 पर 9.

ब्रेयरली ने अब गेंद और मैच समाप्त करने का दायित्व इयन बोथम को सौंप दिया। नम्बर 11 टेरी ऑल्डरमन की स्थिति “Bunny in the headlamps” जैसी। बाहरी किनारा लगा पर तीसरी स्लिप में क्रिस ओल्ड ने कैच टपका दिया। अगली गेंद पर पुनः यही हुआ। क्या भाग्य इंग्लैंड को विजय के इतना निकट लाने के पश्चात छल करने वाला था ?

बॉब विलिस आज के दिन ऐसा कैसे होने दे सकते थे ! कर्कस्टॉल लेन एंड से विलिस अपने 16वें ओवर की पहली गेंद लेकर दौड़े। रे ब्राइट द्वारा ड्राइव का प्रयास, कोई संपर्क नहीं और मिडिल स्टम्प उखड़कर बाहर।

माइक्रोफोन पर रिची बेनो, “Bowled him. It’s all over and it is one of the most fantastic victories ever known in Test Cricket history… England have won this match after one of the most astonishing fightbacks you can ever see.”.

विलिस के इस सार्वकालिक महान स्पेल का इससे सुंदर अंत हो ही नहीं सकता था। ( पिछले 10.1 ओवर में विलिस ने 8 विकेट लिए थे। ) ऑस्ट्रेलियाई कोच पीटर फिलपॉट ने कहा, “Willis was producing some absolute bastard balls.”

रॉबर्ट जॉर्ज डिलन विलिस अब एक नैशनल हीरो थे । कप्तान माइक ब्रेयरली ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “Phoenix From The Ashes” में लिखा है, “Bob Willis had come back from the borders of oblivion to set the Ashes alight.”

दर्शकों की भीड़ से बचने के लिए विलिस तुरन्त पवेलियन की ओर दौड़े, उनके साथी भी स्टम्प उखाड़कर उनके पीछे पीछे। ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज पिच पर किसी मूर्ति की भाँति खड़े थे। बालकनी में ऐलन बॉर्डर अकेले बैठे थे, सिर पर हाथ रखे हुए।

एक समय जिस टेस्ट में इंग्लैंड की जीत के Odds 500-1 थे, वह टेस्ट मैच इंग्लैंड ने 18 रनों के अंतर से जीत लिया था। 1928-29 में चौथे ऐशेज टेस्ट के बाद यह ऐशेज में इंग्लैंड की विजय का सबसे छोटा अंतर था।

ऑस्ट्रेलियाई कप्तान किम ह्यूज्स ने कहा, “We did nothing wrong except lose.”

“Mystery of Aussie Bets Coup”.
दो दिन बाद समाचारपत्र “The Sun” में यह फ्रंट पेज हेडलाइन थी। इसके अनुसार दो ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने हेडिंग्ली टेस्ट के लिए इंग्लैंड की विजय पर दाँव लगाकर £ 7500 कमाए थे। दोनों ने मिलकर मात्र 15 पाउंड (लिली 10, मार्श 5) लगाए थे। (15× 500= 7500). कप्तान किम ह्यूज़्स ने कहा, “Two of the lads gambled – not because they want to bet against their team but because the odds were too good to miss.” डेनिस लिली ने उस समय तो इस समाचार को असत्य बताया पर 1984 में रिटायरमेंट के बाद अपनी आत्मकथा “The Menace” में उन्होंने इसकी पुष्टि की। लंबे समय से उनके मित्र रहे रॉड मार्श इस बात से प्रसन्न नहीं हुए क्योंकि वे आशा कर रहे थे कि समय के साथ ये आरोप भुला दिए जाएंगे।

युवा तेज गेंदबाज जेफ़ लॉसन कहते हैं कि जब सब लोग बेट लगा रहे थे तब उन्होंने अपने ट्राउज़र की जेब टटोली पर कुछ मिला नहीं। कुछ चिल्लर मिल जाता तो विश्वविद्यालय का शुल्क और किराए के लिए धनराशि प्राप्त हो जाती।

बेटिंग और गैंब्लिंग कम्पनी “Ladbrokes” ने £25,000 की बेट्स प्राप्त कीं और मैच के बाद £40,000 चुकाए। Ladbrokes के डायरेक्टर रॉन पॉलार्ड ने “The Sun” से कहा, “हमें यह पूर्ण विश्वास था कि फॉलोऑन खेलने के बाद इंग्लैंड की टीम मैच जीत नहीं सकती। 1894 के पश्चात कोई भी टीम इस स्थिति से निकलकर मैच नहीं जीती थी।”

लॉर्ड्स टेस्ट की दोनों पारियों में 0 पर आउट होने वाले इयन बोथम हेडिंग्ली में मात्र एक बार आउट हुए और उन्होंने एक सार्वकालिक महान पारी सहित कुल 199 रन बनाए। उन्होंने मैच में 109 रन देकर 7 विकेट भी लिए। बोथम को मैन ऑफ द मैच चुनने वाले फ्रेड ट्रूमन ने कहा, “A captain’s performance that came one match too late.”

हेडिंग्ली 1981 इंग्लिश क्रिकेट के स्वर्णिम अध्यायों में से एक है। कप्तान माइक ब्रेयरली का योगदान स्कोरकार्ड देखकर समझ पाना असंभव है पर उनके बिना यह परिवर्तन संभव नहीं था। इंग्लैंड ने ऐशेज में वापसी कर ली थी, श्रृंखला 1-1 से बराबर हो चुकी थी। अगला टेस्ट एजबेस्टन में था जिसकी चर्चा Part 3 में।

साभार:

  1. Rob Steen और Alastair McLellan की पुस्तक “500-1 The Miracle of Headingley ’81”
  2. The Guardian में Rob Steen का लेख “500:1 The day England defied the odds.”
  3. माइक ब्रेयरली की द्वारा श्रृंखला पर लिखी गई पुस्तक “Phoenix From The Ashes”
  4. The Guardian में माइक ब्रेयरली का लेख “Ian Botham’s Ashes’: The myths, the legends and me.”
  5. ESPN Cricinfo पर मार्क निकलस का लेख “Botham, Willis, Brearley, magic: let’s cast our minds back to 1981”
  6. ESPN Cricinfo पर मार्टिन विलियमसन का लेख “The Hero who almost didn’t play.”
  7. क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया का युट्यूब वीडियो “Botham resurrects England”
  8. BBC की डॉक्यूमेंट्री “Botham’s Ashes”
  9. 2011 में आई डॉक्यूमेंट्री “From the Ashes”

चित्र: Getty Images

Botham’s Ashes Part 1: Ian Botham’s media trial and return of old skipper Mike Brearley.

31 मई 1980 को मिडिलसेक्स और समरसेट के काउंटी मैच से पूर्व मिडिलसेक्स के कप्तान माइक ब्रेयरली (जो इंग्लैंड के कप्तान भी थे) को इंग्लिश चयन समिति के प्रमुख ऐलेक बेड्सर का दूरभाष आया कि चयन समिति अब इयन बोथम को नेतृत्व सौंपना चाहती है।

ब्रेयरली ने फरवरी 1980 में ऑस्ट्रेलिया में 0-3 से पराजित होकर लौटने के पश्चात चयन समिति को सूचित कर दिया था कि वे भविष्य के टेस्ट टूर के लिए उपलब्ध नहीं होंगे। प्रथम कारण यह कि वे अपना “Psychoanalysis” का प्रशिक्षण पूर्ण करना चाहते थे। शीतकालीन क्रिकेट में व्यस्त रहने के कारण यह प्रक्रिया कई वर्षों से लंबित थी। दूसरा कारण यह कि उन्हें चयनकर्ता क्लैरी एलियट ने एक पत्र लिखकर इंग्लिश टीम के कप्तान के रूप में योगदान के लिए धन्यवाद दे दिया था।

1980 के इंग्लिश ग्रीष्मकाल के समय ब्रेयरली के स्थान पर 24 वर्षीय ऑलराउंडर इयन टेरेंस बोथम को कप्तान नियुक्त किया गया।

बोथम ने अबतक 25 टेस्ट के करियर में 40.48 की औसत से 6 शतक सहित 1336 रन बनाए थे और 18.53 की औसत से 139 विकेट लिए थे (13 बार पारी में 5 या इससे अधिक विकेट) वे इस समय इंग्लिश टीम के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी थे।

अगले 10 टेस्ट मैचों में 17 पारियों में उन्होंने 14.23 की औसत से मात्र 242 रन बनाए। बल्ले और गेंद दोनों से उनका प्रदर्शन गिर रहा था।

फरवरी-मार्च 1981 में वेस्ट इंडीज़ दौरे पर गई इंग्लैंड की टीम 4 मैचों की सीरीज 2-0 से पराजित होकर लौटी। बोथम ने श्रृंखला में 10.42 की औसत से 73 रन बनाए थे।

जुलाई-अगस्त 1981 में होने वाली ऐशेज श्रृंखला के प्रथम टेस्ट के लिए इयन बोथम ही इंग्लैंड के कप्तान चुने गए थे। चयनसमिति ने यह निर्णय लिया था कि बोथम की कप्तानी का आकलन मैच दर मैच किया जाएगा। बोथम को यह बात रुचिकर नहीं लगी थी परंतु इस समय उन्होंने यह स्वीकार कर लिया था।

The Ashes:
1981 की ऐशेज श्रृंखला के लिए जब ऑस्ट्रेलिया की टीम इंग्लैंड पहुँची तब इंग्लिश मीडिया ने इसे इंग्लैंड का दौरा करने वाली सबसे कमजोर ऑस्ट्रेलियाई टीम बताया। दोनों देशों का मीडिया ऐशेज से पूर्व ऐसे तरीके अपनाने के लिए जाना जाता रहा है पर इस बार बात सही थी। ऑस्ट्रेलिया के दो घातक तीव्र गति के गेंदबाज जेफ़ थॉमसन और लेनी पास्को चोटिल होने के कारण इस टीम का हिस्सा नहीं थे। आरंभिक बल्लेबाज डग वॉल्टर्स को भी टीम में नहीं चुना गया था। सबसे महत्वपूर्ण बात थी कि ग्रेग चैपल ने स्वयं को इस दौरे के लिए अनुपलब्ध घोषित किया था। इस कारण कप्तानी का भार 27 वर्षीय बल्लेबाज किम ह्यूज्स के कंधों पर रख दिया गया था। किम 1880 के बाद ऑस्ट्रेलिया के सबसे युवा कप्तान थे।

1st Test, Trent Bridge, Nottingham: तेज गेंदबाजों के लिए बनी ट्रेंट ब्रिज की पिच पर किम ह्यूज्स ने टॉस जीता और गेंदबाजी का निर्णय लिया। दोनों टीमों ने 4-4 तेज गेंदबाज खिलाए थे। ऑस्ट्रेलियाई स्विंग गेंदबाज टेरी ऑल्डरमन इस श्रृंखला में अपना टेस्ट करियर आरम्भ कर रहे थे। रॉडनी हॉग का यह पहला ऐशेज दौरा था। दोनों ने डेनिस लिली का भरपूर साथ दिया और इंग्लैंड को 185 पर ऑल आउट कर दिया।

इंग्लैंड के पास भी अच्छा गेंदबाजी आक्रमण था। बॉब विलिस, बोथम, ग्रैहम डिली और माइक हेंड्रिक की चौकड़ी ने ऑस्ट्रेलिया को इंग्लैंड से भी बुरी स्थिति में पहुँचा दिया।

Costly Drop: जब कप्तान किम ह्यूज्स आउट हुए तब ऑस्ट्रेलिया का स्कोर था 33 पर 4, नए बल्लेबाज ऑस्ट्रेलिया के भविष्य के कप्तान ऐलन बॉर्डर। ट्रेवर चैपल और ऐलन बॉर्डर के बीच एक अच्छी साझेदारी पनपने लगी। स्कोर 51/4, यहाँ माइक हेंड्रिक की गेंद पर पॉल डाउनटन ने ऐलन बॉर्डर का कैच टपका दिया। जहाँ कोई अन्य ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज 20 रन भी न बना सका वहाँ बॉर्डर ने 63 रनों की साहसी पारी खेली। बॉर्डर ने 8वें विकेट के लिए लिली के साथ 37 और 10वें विकेट के लिए टेरी ऑल्डरमन के साथ 26 रन जोड़कर ऑस्ट्रेलिया का स्कोर 179 तक पहुँचा दिया। इंग्लैंड की पहली पारी की बढ़त, जिसके 50 से अधिक होने की आशा थी, वह 6 पर सीमित हो गयी थी। इंग्लैंड की दूसरी पारी और भी दयनीय रही और मात्र 38.4 ओवरों में 125 ऑल आउट। डेनिस लिली और टेरी ऑल्डरमैन ने 5-5 विकेट लिए।

Australia Victorious:
ऑस्ट्रेलिया के समक्ष 132 रनों का लक्ष्य था, जो 6 विकेट खोकर प्राप्त कर लिया गया। 1948 की सर डॉनल्ड ब्रैडमन की अजेय टीम के बाद ट्रेंट ब्रिज में ऑस्ट्रेलिया की पहली विजय थी।

Skipper under pump:
कप्तान इयन बोथम पर दबाव में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जा रही थी। हालाँकि वे अपने साक्षात्कारों में यह बात पूर्णरूप से स्वीकार नहीं कर रहे थे। बी.बी.सी के पीटर वेस्ट ने एक साक्षात्कार में उनसे पूछा कि एक एक टेस्ट मैच के लिए कप्तान बनाए जाना बड़ा विचित्र लगता होगा तब बोथम का उत्तर था, “मुझसे अधिक दबाव का अनुभव मेरा परिवार कर रहा है। मैं मानता हूँ कि एक कप्तान के रूप में मैं सदैव सुधार करता आ रहा हूँ। आशा है अगले मैच मैं अपने बल्ले से प्रदर्शन करूँगा और आलोचकों को चुप करा पाऊँगा।” इयन बोथम ऐसा करने में असफल रहे।

King Pair at Lord’s:
लॉर्ड्स में उन्हें पुनः एक मैच के लिए कप्तान बनाया गया। यह टेस्ट ड्रॉ रहा पर बोथम दोनों पारियों में शून्य पर आउट हुए।

बोथम ने लिखा है, “As I came back towards the pavilion gate not a soul among the Lord’s members mumbled `bad luck’ and not a single MCC member looked me in the eye.They all just sat there dumbstruck. Some picked up their papers and hid behind them, others rummaged in their bags. Needless to say, I was fuming.”

श्रीमती केथी बोथम भी इयन का समर्थन करते हुए कहती हैं, “I saw them as dark-suited vultures who had been waiting for the kill.”

Botham’s Resignation:
ट्रेंट ब्रिज टेस्ट के पश्चात पीटर वेस्ट के साथ साक्षात्कार में वे प्रसन्न दिखाई पड़ रहे थे परंतु लॉर्ड्स टेस्ट के पश्चात पीटर वेस्ट को ही दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा, “मैंने चयनसमिति के अध्यक्ष को सूचित कर दिया कि एक एक मैच के आधार पर मेरी कप्तानी का आकलन न्यायपूर्ण नहीं है। मुझे समझ नहीं आ रहा है कि यह क्या हो रहा है और न ही मेरी टीम को समझ आ रहा है। इसका कुप्रभाव मेरे खेल पर पड़ रहा है, अतः अब मैं कप्तान बने नहीं रहना चाहता।”

अपनी कप्तानी में 12 टेस्ट की 21 पारियों में बोथम ने 13.14 की औसत से 276 रन रन बनाए थे। करियर के तीसरे टेस्ट के बाद पहली बार उनकी औसत 30 से नीचे (29.85) आ गई थी जो कप्तान बनने से पूर्व 40.48 थी। अंतिम 20 पारियों में 4 बार शून्य और कोई अर्धशतक नहीं।

चयनसमिति के अध्यक्ष ऐलेक बेड्सर ने कहा कि चयनसमिति ने निर्णय कर लिया था कि तृतीय टेस्ट से पूर्व कप्तानी में परिवर्तन करना ही है। बेड्सर ने स्वीकार किया कि बोथम की कप्तानी में सुधार भी हो रहा था पर चयनसमिति उनके निजी प्रदर्शन को लेकर चिंतित थी। उनके साथ उनका परिवार भी दबाव में था। अतः उन्हें कप्तानी के बोझ से मुक्त करना उचित निर्णय था।

The Botham Trial:
लॉर्ड्स में एक समाचारपत्र का होर्डिंग देखने को मिला, “BOTHAM MUST GO.” BBC का कार्यक्रम “Newsnight” जो कभी खेलों से संबंधित समाचार में रुचि नहीं रखता था, “The Botham Trial” नामक कार्यक्रम चला रहा था जिसमें बोथम का मीडिया ट्रायल हो रहा था।

ऑस्ट्रेलियाई समाचारपत्र Sydney Sun के Frank Crook कहते हैं, “इंग्लैंड क्रिकेट टीम और इंग्लिश मीडिया के बीच संबंध बहुत तनावपूर्ण थे। अधिकांश इंग्लिश खिलाड़ी स्वदेशी पत्रकारों के स्थान पर मुझसे बात करने में प्रसन्न थे।”

“It looked like lobbing a hand grenade, with the pin long out, into the hands of the most promising recruit.”

Sunday Times के लिए Robin Marlar ने लिखा, “बोथम को कप्तानी समय से पूर्व दे दी गई थी। भूतकाल में देखने पर यह निर्णय और भी भयावह लगता है। मानो आपने हैंडग्रेनेड का पिन निकालकर उसे अपने सबसे क्षमतावान योद्धा की ओर उछाल दिया हो।”

पीटर वेस्ट ने इयन बोथम से पूछा कि यदि उन्हें अगला कप्तान चुनना हो तो वे किसे चुनेंगे तो बोथम का उत्तर बड़ा स्पष्ट था, “मैं इस समय इस देश में उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ कप्तान को चुनूँगा। जिनकी कप्तानी में मैंने अपनी सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट खेली है। जो अपने खिलाड़ियों से उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करवाना जानते हैं।”

Return of Mike Brearley:
इयन बोथम जिस व्यक्ति के गुणों का वर्णन कर रहे थे, वे कोई और नहीं बल्कि पूर्व कप्तान माइक ब्रेयरली थे। ब्रेयरली का एक बल्लेबाज के रूप में कीर्तिमान वर्णन करने योग्य नहीं है परंतु वे अद्भुत नेतृत्वक्षमता के धनी थे। 39 वर्ष की आयु में वे पुनः इंग्लैंड के कप्तान थे। उन्हें अगले 3 टेस्ट मैचों के लिए कप्तानी सौंपी गई थीं।

इंग्लिश क्रिकेट से जुड़े बहुत से लोगों का मानना था कि बोथम का टीम में स्थान ही नहीं बनता। भूतपूर्व इंग्लिश कप्तान Ray Illingworth ने “Sunday Mirror” में प्रकाशित अपने स्तम्भ में बोथम के विषय में लिखा, “Overweight, Overrated and Overpaid”

ऑस्ट्रेलियाई देख रहे थे कि इंग्लैंड की टीम बिखर रही है। वे ब्रेयरली को एक अच्छा कप्तान मानते थे पर ब्रेयरली को चुनने से उनकी अपेक्षा श्रेष्ठ इंग्लिश बल्लेबाज (बॉब वूल्मर) को बाहर बैठना पड़ेगा यह जानकर ऑस्ट्रेलियाई टीम प्रसन्न थी। (वूल्मर ने इस श्रृंखला की 4 पारियों में मात्र 30 रन बनाए थे।)

1888 के पश्चात ऑस्ट्रेलियाई टीम ने ऐशेज में बढ़त लेने के बाद कभी श्रृंखला नहीं गँवाई थी। क्या इस बार कुछ परिवर्तन होना था ? क्या माइक ब्रेयरली अपने इस अंतिम कार्यकाल में कुछ चमत्कार कर सकते थे ? क्या इयन बोथम कप्तानी से बोझ से मुक्त होकर डेढ़ साल पुराने बोथम की तरह खेल सकते थे?

साभार :

  1. BBC द्वारा निर्मित डॉक्यूमेंट्री “Botham’s Ashes.”
  2. माइक ब्रेयरली की इस श्रृंखला पर लिखी गयी पुस्तक “Phoenix From The Ashes”
  3. Rob Steen और Alastair McLellan की पुस्तक “500-1 The Miracle of Headingley ’81”
  4. The Guardian में प्रकाशित Steven Pye का लेख, “Ashes 1981: How Captain Beefy became Butterfingers Botham at Trent Bridge”
  5. ESPN Cricinfo पर Martin Williamson का लेख, “So nearly Botham’s annus horribilis”

चित्र: Getty Images

  1. इयन बोथम 1 रन पर टेरी ऑल्डरमन की गेंद पर बोल्ड।
  2. इयन बोथम द्वारा ऐलन बॉर्डर का कैच छूटना।
  3. ट्रेंट ब्रिज में मैन ऑफ द मैच डेनिस लिली।
  4. माइक ब्रेयरली और इयन बोथम।

To be continued….

“Why do we fall sir ? So that we can learn to pick ourselves up.”

ऋषभ पंत: भारतीय क्रिकेट टीम के तरुण, तेजस्वी और अपरिमित क्षमता के धनी विकेटकीपर बल्लेबाज। इंडियन प्रीमियर लीग 2020 में ऋषभ पंत का प्रदर्शन वर्णन योग्य नहीं था, ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है पर बुरी बात यह थी कि वे ओवरवेट हो गए थे और इसी कारण ऑस्ट्रेलिया जाने वाली सीमित ओवरों के भारतीय दल में चयनित नहीं हुए। टेस्ट दल में ऋषभ को स्थान मिला परंतु प्रथम टेस्ट की एकादश में ऋद्धिमान साहा को उनपर वरीयता दी गई। जिन्हें श्रृंखला के प्रथम टेस्ट की एकादश में स्थान दिये जाने योग्य नहीं समझा गया था वे ऋषभ पंत बॉर्डर गावस्कर ट्रॉफी के लिए खेली जा रही श्रृंखला में भारतीय दल के नायक सिद्ध हुए थे।

“India incredible. Rishabh Pant is the star. India win the test. They win the series and they win the hearts and minds of cricket fans all around the world. Test Cricket’s heart is beating hard, it’s beating true. One of the most incredible sporting performances ever seen on Australian soil. They were down, they were out and India have risen.” — ब्रिस्बेन के गैबा में चतुर्थ और निर्णायक टेस्ट में ऋषभ पंत के विजयी चौके के उपरांत ये शब्द थे फॉक्स क्रिकेट के कॉमेंटेटर मार्क हावर्ड के।

टेस्ट क्रिकेट अपने आप में जीवन है। न मात्र यह सर्वोच्च कौशल का खेल है, प्रत्युत यह खिलाड़ी की तितिक्षा, धैर्य और जटिल परिस्थितियों में ढलने की योग्यता की परीक्षा भी है। प्रत्येक सत्र, प्रत्येक दिन के साथ परिवर्तित होता खेल। आप लहरों पर तभी चल सकते हैं जब आपमें चक्रवात से लड़ने की दृढ़ता हो।

“The Gabbattoir”
ऐडिलेड, मेलबर्न और सिडनी के बाद श्रृंखला ब्रिस्बेन पहुँची थी। भारतीय दल ने अबतक इस श्रृंखला में जो प्राप्त किया था। उसे देखते हुए यह उपयुक्त था कि वे इस परीक्षा का समापन सबसे कठिन मैदान ऑस्ट्रेलिया के अभेद्य दुर्ग गैबा में करें। नवम्बर 1988 के पश्चात ऑस्ट्रेलिया गैबा में कभी पराजित नहीं हुई थी और भारत को यहाँ कभी विजय नहीं मिली थी। [1988 में विव रिचर्ड्स की वेस्ट इंडीज़ ने ऑस्ट्रेलिया को 9 विकेट से पराजित किया था, उस टीम के तेज गेंदबाज थे, मैल्कम मार्शल, पैट्रिक पैटरसन, कर्टली ऐम्ब्रोस, कर्टनी वॉल्श। जिन्होंने मैच में 17 विकेट लिए थे।]

जब यह समाचार आया कि क्वीन्सलैंड राज्य के कठोर क्वारन्टीन नियमों के कारण भारतीय टीम ब्रिस्बेन के लिए यात्रा नहीं करना चाहती तो ऑस्ट्रेलियाई मीडिया ने बिना विलंब यह घोषित कर दिया कि भारतीय दल गैबा से भयाक्रांत है।

चोट के कारण भारतीय दल के पास गैबा के लिए एकादश बनाना भी दुष्कर कार्य था। अश्विन, बुमरा, शमी, ईशांत, उमेश, जडेजा जैसे गेंदबाज चोटिल होकर बाहर थे। विराट कोहली के अतिरिक्त हनुमा विहारी भी बाहर थे।

पैट कमिन्स, जॉश हेजलवुड, मिचेल स्टार्क और नेथन लायन से सुसज्जित ऑस्ट्रेलियाई दल के गेंदबाजी आक्रमण के पास 1013 टेस्ट विकेट थे और भारतीय दल के पास मात्र 13. नेट के गेंदबाजों के रूप में ऑस्ट्रेलिया गए नवदीप सैनी और वॉशिंगटन सुंदर ने इस मैच में टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण किया। शार्दूल ठाकुर का भी लगभग पदार्पण ही माना जाए क्योंकि इससे पहले उन्होंने 2017 में एक टेस्ट खेला था और दो ओवर में ही चोटिल होकर बाहर हो गए थे। नवदीप सैनी का पदार्पण सिडनी में तृतीय टेस्ट में हुआ था और सिराज का मेलबर्न में द्वितीय टेस्ट में। इस आक्रमण के साथ उतरी भारतीय टीम यदि पराजित भी हो जाती तो भारतीय समर्थक संतोष कर लेते।

फास्ट फॉरवर्ड: 5वाँ दिन, 19 जनवरी 2021: गैबा में अंतिम दिन भारत को 98 ओवरों में 324 रनों की आवश्यकता थी। सभी विकेट सुरक्षित थे। 1975 के बाद गैबा में किसी भी टीम ने चौथी पारी में दो सौ से ऊपर का लक्ष्य प्राप्त नहीं किया था। भोजनावकाश  तक स्कोर 38 ओवर में 83 पर 1, मेलबर्न में अपना टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण करने वाले शुभमन गिल 64 पर खेल रहे थे। दूसरे सत्र में ड्रिंक्स से ठीक पूर्व शुभमन 91 रन बनाकर आउट हो गए। 57वें ओवर में ऋषभ पंत बल्लेबाजी करने आए तब स्कोर था, 167/3, कप्तान अजिंक्या रहाणे 24 रन बनाकर तुरंत आउट हुए थे। चायकाल तक स्कोर हो गया, 63 ओवर में 184/3, अंतिम सत्र के 37 ओवरों में 145 रनों की आवश्यकता। श्रृंखला का अंतिम सत्र था और अभी भी परिणाम कुछ भी हो सकता था। इस रोमांचक श्रृंखला के समापन के लिए इससे बढ़िया पटकथा क्या हो सकती थी !

ऋषभ पंत आक्रमण कर सकते हैं, इस तथ्य से संपूर्ण क्रिकेट समुदाय अवगत था परंतु अभी तक वे अपनी परिपक्वता का परिचय देते हुए स्वभाव के विपरीत खेल रहे थे और 48 गेंद में 16 पर थे। 71वें ओवर में लायन की अंतिम गेंद को उन्होंने आगे निकलकर लॉन्ग ऑन और मिडविकेट के बीच से 6 रनों के लिए दर्शक दीर्घा में भेज दिया और भारत का स्कोर 200 के पार चला गया। यह शॉट ऋषभ के साहस का परिचय दे रहा था, क्योंकि पिछली ही गेंद पिच की दरारों पर गिरकर पहली स्लिप की ओर गई थी। लायन के पिछले ओवर में भी आगे बढ़कर शक्तिशाली प्रहार के प्रयास में पंत स्टंप होने से बचे थे।

Exuberance of youth:
ऋषभ पंत की बात करते हुए रवि शास्त्री कहते हैं, 22-23 वर्ष की आयु में आप भयमुक्त होकर क्रिकेट खेलते हैं। जैसे जैसे करियर बढ़ता जाता है, बैगेज और बाहरी दबाव बढ़ने लगता है, हर मैच में प्रदर्शन करने की अपेक्षा होने लगती है। यहाँ वास्तविक जीवन आरम्भ होता है।

80 ओवर के बाद स्कोर 228/3, अंतिम 20 ओवरों में 100 रनों की आवश्यकता, 7 विकेट हाथ में। ऋषभ पंत 84 गेंद में 34 पर। दूसरे छोर पर उपस्थित थे 2018-19 में ऑस्ट्रेलिया में भारतीय विजय के नायक चेतेश्वर पुजारा। 5वें दिन उन्होंने शरीर के लगभग हर भाग से ऑस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाजों की शॉर्ट गेंदों को खेला। हेलमेट, पसली समेत शरीर के उपरार्ध के अतिरिक्त उन्होंने उंगली पर भी चोट खाई पर डटे रहे। दूसरी नई गेंद का समय। श्रृंखला के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी पैट कमिन्स के हाथ में गेंद। दूसरी ही गेंद “Nip Backer” चेतेश्वर पुजारा के बल्ले के अंदरूनी किनारे को पीछे छोड़ती हुई पैड पर।

“After heroics of Sydney he’s the main man here at the Gabba”
अब मैच का परिणाम ऋषभ पंत के प्रदर्शन पर निर्भर करता था। क्या एक और भारतीय बल्लेबाजी कोलैप्स देखने को मिलने को मिलने वाला था ?  नहीं… ऋषभ पंत आज ऐसा होने की अनुमति कैसे दे सकते थे ! हेजलवुड के अगले ओवर में उन्होंने एक सुंदर कवर ड्राइव और कमिन्स के अगले ओवर में स्क्वेयर ड्राइव से चौके प्राप्त किए। 84वें ओवर की अंतिम गेंद पर ऋषभ ने अपना अर्धशतक पूर्ण कर लिया।

श्रृंखला के अंतिम ड्रिंक्स ब्रेक का  समय। स्कोर 259/4, 15 ओवरों में 69 रनों की आवश्यकता। अगले 7 ओवरों में कमिन्स और लायन ने मात्र 19 रन दिए और मयंक अग्रवाल का विकेट गिरा। 93वें ओवर में सुंदर ने कमिन्स को आत्मविश्वास से भरा अद्भुत हुक शॉट लगाया, 6 रन। सुंदर ने पहली पारी में भी शार्दूल ठाकुर के साथ उत्कृष्ट बल्लेबाजी की थी और 7वें विकेट के लिए 123 रनों की साझेदारी द्वारा भारत को कठिन परिस्थिति से निकाला था।

राउंड द विकेट से नेथन लायन। ऋषभ ने ठान ली थी कि इस ओवर के बाद एक ही परिणाम सम्भावित बचना चाहिए, भारत की विजय। दूसरी गेंद, ऑफ स्टम्प के बाहर, ऋषभ ने लैप स्वीप/स्कूप खेला और चौका प्राप्त किया। तीसरी गेंद को ऑफ स्टंप के बाहर से उठाकर एक शक्तिशाली स्वीप, एक और चौका। नेथन लायन के इस ओवर से 15 रन (4 बाई सहित) आए। हेजलवुड के अगले ओवर में लेग बाई से चौका सहित 9 रन आए और अब 5 ओवरों में मात्र 15 रनों की आवश्यकता, 5 विकेट हाथ में। लायन के अगले ओवर में 5 रन बने और सुंदर का विकेट गिरा। 4 ओवर में 10 रनों की आवश्यकता। ऑस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाज श्रान्त- क्लान्त हो चुके थे।

97वाँ ओवर, जॉश हेजलवुड:  ऋषभ ने कुछ मिनट पूर्व Falling Scoop खेला था, अब Falling Pull की बारी थी। लेग साइड की ओर शॉर्ट गेंद। भँवर की भाँति घूमकर ऋषभ पंत का “Swivel Pull” और चार रन। आवश्यक रनों की संख्या अब एक अंक में आ गई थी। दूसरी गेंद पर एक रन, तीसरी पर शार्दूल ठाकुर ने दो रन लिए और चौथी गेंद शार्दूल के बल्ले का ऊपरी किनारा लेकर हवा में चली गई थी। पिच पर ऋषभ और शार्दूल एक दूसरे को पार कर चुके थे। नेथन लायन ने एक आसान कैच लिया पर अब ऋषभ स्ट्राइक पर थे।

The Proverbial Fortress has been conquered.
विजयी शॉट: गैबा के लौकोक्तिक दुर्ग को ध्वस्त करने हेतु 19 गेंदों में 3 रनों की आवश्यकता। ओवर द विकेट से जॉश हेजलवुड, यॉर्कर के प्रयास में नीचे रही फुलटॉस, ऋषभ का पुश, मिड ऑफ पर कोई क्षेत्ररक्षक नहीं। गेंद सीमारेखा की ओर जाती हुई, ऋषभ और नवदीप सैनी दूसरे रन के लिए दौड़ते हुए, गेंद सीमारेखा के बाहर। रन के बीच ही दोनों खिलाड़ी बल्ला उठाकर विजयघोष करते हुए। ऋषभ पंत अविजित 89 रन।

“टूटा है गाबा का घमंड” सोनी के हिंदी कॉमेंट्री बॉक्स में विवेक राजदान के शब्द अविस्मरणीय हो गए। 

संध्याकाल था, सूर्यदेव अस्ताचलगामी थे और ऑस्ट्रेलिया के “सनशाईन स्टेट” में भारतीय क्रिकेट के नए सूर्य का उदय हो रहा था।

रवि शास्त्री ने एक प्रेस वार्ता में कहा था कि उन्होंने ऋषभ पंत को स्पष्ट शब्दों में अवगत कराया था कि क्रिकेट का खेल सम्मान चाहता है और ऋषभ द्वारा खेल को और सम्मान दिये जाने की आवश्यकता है। ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध टेस्ट श्रृंखला में ऋषभ के प्रदर्शन ने सिद्ध किया कि उन्होंने कोच की बात को आत्मसात कर लिया था। फिटनेस पर उन्होंने जो परिश्रम किया वह उनकी विकेटकीपिंग में भी दिखाई पड़ा।

ऋषभ पंत, स्मितमुख, आँखों में हर्ष के अश्रु लिए हुए, भारतीय ध्वज को उठाए अपने साथियों के साथ विजय फेरी पूर्ण कर रहे थे।

एक मास पूर्व ऐडिलेड ओवल में 36 पर ऑल आउट होने के पश्चात भारतीय टेस्ट दल ने 2-1 से श्रृंखला जीतकर ऑस्ट्रेलिया को स्तब्ध कर दिया था। टेस्ट क्रिकेट इतिहास की महानतम श्रृंखला का समापन एक ऐतिहासिक विजय के साथ।

लोकोक्ति है- “The Night is darkest just before the dawn.” —–  But what sky is ever really dark with a star like Rishabh.

अगले दिन सभी प्रमुख ऑस्ट्रेलियाई समाचारपत्रों के मुखपृष्ठ इस भारतीय उपलब्धि की प्रशंसा से भरे हुए थे।

The Herald Sun ने लिखा था “India’s Gabba Miracle: Aussies get Pantsed.”

“The day when Fortress Gabba was stormed by a group of cavalier raiders who kicked down the drawbridge, stole the crown jewels and raced off into the late afternoon sunshine towards hysterical fans who will cherish this memory forever. Take it all India. You deserve it…Australia are no longer bully boys of the game. They have been stared down by the impeccable forces of an Indian team.”

The Sydney Morning Herald ने लिखा “A staggering innings from Rishabh Pant steered India to an unlikely series win over Australia at the Gabba yesterday.”

The Daily Telegraph ने लिखा, “India embarrass our Cricket stars in incredible victory.”

The Australian ने लिखा, “Posterity wins ‘a great day of Test Cricket'”

The Mercury ने लिखा, “When all the world thought India was terrified about visiting Fortress Gabba it hatched a cunning plan…. to storm it!”

भगवान को धन्यवाद दें कि आप इस क्षण के साक्षी रहे। आप ऐसे क्षणों की प्रतीक्षा करते हैं, जब अकल्पनीय सफलता प्राप्त हो जाती है। जब नए नायक बनते हैं और इतिहास लिखा जाता है। यह अविश्वसनीय था, कल्पनातीत था, स्वप्नों से परे था। इस मैच ने भारतीय क्रिकेट को जो स्मृतियाँ दी हैं, उन्हें जीवनपर्यंत नहीं भुलाया जा सकता।

4 अक्टूबर को ऋषभ पंत 24 वर्ष के हो रहे हैं। उन्हें जन्मदिन की अग्रिम शुभकामनाएँ। भगवान से प्रार्थना है कि ऋषभ भारतीय क्रिकेट समर्थकों को हर्षित होने के अवसर प्रदान करते रहें।

#HappyBirthdayRishabhPant

साभार:

1. ESPN Cricinfo Commentary.

2. ESPN Cricinfo पर संबित बल का लेख “India have created the greatest moment in their Test history.”

चित्र: Getty Images

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